महाभारत के देदीप्यमान चरित्रों में अन्यतम स्थान कर्ण का है। जन्म से प्राप्त कवच-कुंडलों को देने का साहस सिर्फ दानवीर कर्ण ही कर सकता था और उसने वैसा किया भी ऐसा ही। शक्र, ब्राह्मण वेश में आकर 'महत्तरां भिक्षांयाचे' की माँग करता है। सहस्रों गायों, अश्वों, हाथियों और सोने का प्रस्ताव अस्वीकार किए जाने पर वह अपने अग्निष्टोम यज्ञ का फल भी अर्पित करना चाहता है। यह भी अस्वीकृत होने पर वह भाँप जाता है कि अवश्य ही कपटी कृष्ण द्वारा प्रेरित यह ब्राह्मण मेरा कवच और कुण्डल लेना चाहता है। जैसे ही वह इन्हें देने का प्रस्ताव देता है वह तुरन्त स्वीकार कर लेता है। शल्यराज, जो युद्ध में उसका सारथी था, मना करने पर भी वह अपना कवच और कुंडल काटकर अर्पित कर देता है और यह कहता है कि समय के साथ सभी चीजें नष्ट हो जाती हैं केवल दिया हुआ दान और हवन आदि यज्ञ-कार्य ही नष्ट नहीं होते बल्कि मानव सभ्यता को नया प्रकाश देने के लिए प्रकाश स्तम्भ का कार्य करते हैं, जिनके आलोक में सभ्यता विकास के नए सोपानों को पार कर सके।