Question
मेरी प्रिय पुस्तक

Answer

पाठ्यपुस्तकों के साथ$-$साथ मुझे अन्य पुस्तकें पढ़ने का भी शौक है। मैं अपने विद्यालय के पुस्तकालय से कई अच्छी पुस्तकें लाकर पढ़ता रहता हूँ। इनमें से मुझे गाँधीजी की आत्मकथा 'सत्य के प्रयोग सबसे अधिक प्रिय है।
गाँधीजी ने यह पुस्तक अपनी मातृभाषा गुजराती में लिखी थी। हिन्दी, मराठी और अंग्रेजी में इसका अनुवाद हुआ है। भारत की अन्य भाषाओं में भी इसके अनुवाद हुए हैं। गाँधीजी अपने जीवन में सत्य को सबसे अधिक महत्व देते थे।
'सत्य के प्रयोग' पुस्तक में गाँधीजी ने अपनी कमियों एवं बुराइयों का भी खुलकर वर्णन किया है। उन्होंने अपने धूम्रपान, मांसाहार व चोरी करने आदि के बारे में कुछ भी नहीं छिपाया। हर जगह उन्होंने अपनी गलतियों का स्वीकार किया है। उन्होंने यह भी बताया है कि किस प्रकार वे इन बुराइयों के चक्कर में फँसे और कैसे उन्होंने इनसे छुटकारा पाया गाँधीजी ने अपनी शिक्षा विलायत यात्रा, वकालत, दक्षिण अफ्रिका में सत्याग्रह तथा भारत के स्वतंत्रता आंदोलनों की इस पुस्तक में विस्तृत चर्चा की है। गाँधीजी के ये संस्मरण हमें सदा प्रेरणा देते रहते हैं।
इनसे हमें सीख मिलती है कि एक साधारण व्यक्ति भी किस तरह इतना महान बन सकता है। गाँधीजी अपनी सच्चाई, लगन, ईमानदारी और आत्मबल से हमारे देश के महान नेता और युगपुरुष बन गए। इन्हीं गुणों के कारण आज हम उन्हें 'राष्ट्रपिता' के रूप में याद करते हैं। इस पुस्तक की भाषा बहुत सरल और हृदय को छू लेनेवाली है। इसकी शैली भी बहुत रोचक है।
इस पुस्तक को पढ़ने से पाठक के हृदय में सत्य, अहिंसा, प्रेम, आत्मविश्वास तथा मानव सेवा के भाव जागृत होते हैं। गाँधीजी की आत्मकथा पढ़कर मुझे बहुत लाभ हुआ है। इसके प्रभाव से मैंने कई बुरी आदतों से छुटकारा पाया है।
मेरी तरह कई लोगों ने गाँधीजी की आत्मकथा पढ़कर अपने जीवन की राह बदल डाली है। यह पुस्तक मेरी मित्र, गुरु और मार्गदर्शक बन गई है। मैं चाहता हूँ कि प्रत्येक भारतीय गाँधीजी की आत्मकथा अवश्य पढ़े।

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