Question
निर्देशन का महत्त्व स्पष्ट कीजिये।

Answer

निर्देशन का महत्त्व
निर्देशन का संगठन में महत्त्व इस कथन से समझा जा सकता है कि संगठन में प्रत्येक क्रियाकलाप अर्थात् प्रत्येक कार्य का प्रारम्भ केवल निर्देशन के द्वारा ही होता है। यह व्यक्तियों या कर्मचारियों को, समान उद्देश्यों की पूर्ति के लिए एकत्रित. करता है। इसके माध्यम से ही प्रबन्धक संस्था में न केवल कर्मचारियों को यह बतलाते हैं कि उन्हें क्या करना चाहिए, कब करना चाहिए तथा कार्य को कैसे करना है बल्कि यह भी देखता है कि उसके निर्देशों का क्रियान्वयन उपयुक्त परिप्रेक्ष्य में हुआ है या नहीं। यह संगठन के प्रभावपूर्ण कार्य निष्पादकता में एक महत्त्वपूर्ण कारक के रूप में कार्य करता है। प्रबन्धक के इस कार्य की सफलता पर अन्य कार्यों की सफलता निर्भर करती है क्योंकि यह कार्य अन्य सभी कार्यों में परस्पर सम्बन्ध भी स्थापित करता है तथा संस्था की सफलता को सुनिश्चित करता है। निर्देशन के व्यापक महत्त्व के कारण ही मार्शल ई. डिमोक ने कहा है कि "निर्देशन प्रबन्ध प्रक्रिया का हृदय है।" यह कथन शतप्रतिशत सही है और हम इससे पूर्णतया सहमत हैं। निर्देशन के व्यापक महत्त्व को हम संक्षेप में निम्न प्रकार से स्पष्ट कर सकते हैं-
1. संगठन में व्यक्तियों के कार्यों को प्रारम्भ करने में सहायता करना-संगठन में व्यक्तियों अर्थात् कर्मचारियों के उन कार्यों को प्रारम्भ करने में निर्देशन सहायता करता है जो संस्था के वांछित उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किये जाते हैं।
2. संगठन में कर्मचारियों के व्यक्तिगत प्रयासों में सामन्जस्य स्थापित करना-निर्देशन संगठन में कर्मचारियों के व्यक्तिगत प्रयासों में इस प्रकार सामन्जस्य स्थापित करता है कि प्रत्येक कर्मचारी के कार्य का योगदान संस्था के कार्यों के निष्पादन में तथा सफलता में हो।
3. कर्मचारियों का मार्गदर्शन एवं नेतृत्व प्रदान करना-निर्देशन कर्मचारियों का मार्गदर्शन इस प्रकार करता है कि वे अपनी क्षमताओं एवं योग्यताओं का पूर्ण उपयोग कर सकें। इसके लिए निर्देशन उन्हें प्रोत्साहित करता है तथा प्रभावपूर्ण नेतृत्व भी प्रदान करता है। एक अच्छा नेता सदैव अपने कर्मचारियों की कार्यक्षमता की पहचान करने में सक्षम होता है तथा उन्हें प्रोत्साहित करता है कि वे उस क्षमता का पूर्ण उपयोग कार्य निष्पादन में कर सकें।
4. संगठन में आवश्यक परिवर्तनों को प्रारम्भ करने में मदद करना-निर्देशन संगठन में आवश्यक परिवर्तनों को प्रारम्भ करने में मदद करता है। सामान्यतया कर्मचारी संगठन में नये परिवर्तनों का विरोध करते हैं। अभिप्रेरणा के द्वारा प्रभावी निर्देशन सम्प्रेषण तथा नेतृत्व में सहायता करता है।
5. संस्था में स्थिरता तथा सन्तुलन बनाये रखना-प्रभावी निर्देशन संस्था में स्थिरता तथा संतुलन बनाये रखने में भी सहायता प्रदान करता है क्योंकि यह आपसी सहयोग तथा प्रतिबद्धता को लोगों के बीच बढ़ाता है तथा विभिन्न समूहों, क्रियाओं तथा विभागों के मध्य संतुलन बनाये रखने में भी सहायक होता है।
6. वास्तविक कार्यों तथा योजनाओं या निर्णयों में दूरी को समाप्त करना-निर्देशन से वास्तविक कार्यों तथा पूर्ण नियोजित कार्यों या निर्णयों के बीच की दूरी को समाप्त (पाया) किया जा सकता है। निर्देशन में प्रबन्धक यह देखता है कि कार्य पूर्व निर्धारित योजनाओं या निर्णयों के अनुरूप हो रहे हैं अथवा नहीं। यदि नहीं, तो वह आवश्यक मार्गदर्शन एवं आदेश-निर्देश देता है।
7. प्रभावकारी समन्वय की प्राप्ति में सहायकनिर्देशन से संस्था में प्रभावकारी समन्वय की प्राप्ति संभव है। प्रभावकारी निर्देशन से संस्था के सभी व्यक्तियों, विभागों तथा कार्यों में समन्वय के साथ-साथ बाहरी पक्षकारों, सरकार, ग्राहक, प्रतिस्पर्धी संस्थाओं इत्यादि के साथ भी प्रभावकारी समन्वय आसानी से स्थापित हो जाता है।
8. मानवीय संसाधनों का विकास-प्रभावकारी निर्देशन संस्था के मानवीय संसाधनों का समुचित विकास करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। प्रबन्धक निर्देशन कार्य के अन्तर्गत कर्मचारियों को आदेश-निर्देश ही नहीं देता है बल्कि उन्हें अभिप्रेरित भी करता है तथा उचित नेतृत्व भी प्रदान करता है।
9. भावी प्रबन्धकों का विकास-निर्देशन एक ऐसा कार्य है जिससे भावी प्रबन्धकों के विकास में भी सहायता मिलती है। जब प्रबन्धक अपने अधीनस्थों को आदेश-निर्देश देते हैं, अभिप्रेरित करते हैं या नेतृत्व प्रदान करते हैं, तो वे सभी अधीनस्थ भी धीरे-धीरे उस कला को सीखने लगते हैं। इससे भावी प्रबन्धकों का स्वतः विकास होने लगता है।
10. व्यावसायिक संस्था की सफलता के लिए आवश्यक-निर्देशन के सहारे ही व्यावसायिक संस्थाएँ अपनी व्यावसायिक योजनाओं एवं निर्णयों को क्रियान्वित करती हैं। इसके सहारे ही व्यावसायिक योजनाओं एवं निर्णयों को क्रियान्वित किया जाता है। इसी से संस्था के सभी संसाधनों का पूर्ण कुशलता के साथ उपभोग किया जा सकता है।
11. अन्य प्रबन्धकीय कार्यों के संयोजन में सहायक-निर्देशन वह कार्य है जो प्रबन्ध के अन्य सभी कार्यों के बीच की एक कड़ी है। नियोजन एवं संगठन प्रबन्ध के प्रारम्भिक कार्य हैं, जबकि नियन्त्रण प्रबन्ध प्रक्रिया का अन्तिम कार्य है। निर्देशन इनके बीच का कार्य है जिसके एक ओर नियोजन एवं संगठन कार्य है तो दूसरी ओर नियन्त्रण का कार्य है। निर्देशन कार्य के द्वारा ही इन शेष कार्यों का संयोजन सम्भव है। शेष कार्यों की सफलता निर्देशन की सफलता में निहित है।
12. उद्देश्यों की प्राप्ति में सहायक-निर्देशन संस्था के ही नहीं, कर्मचारियों के व्यक्तिगत एवं सामूहिक उद्देश्यों की पूर्ति में भी सहायक है। प्रभावकारी निर्देशन के द्वारा प्रबन्धक संस्था में ऐसा वातावरण उत्पन्न कर सकता है जिससे संस्था के उद्देश्यों को प्राप्त करना आसान हो जाता है। इतना ही नहीं, इस वातावरण में संस्था के कर्मचारियों के व्यक्तिगत एवं सामूहिक सभी उद्देश्य भी आसानी से प्राप्त किये जा सकते हैं।
13. सामूहिक कार्यों की सफलता में सहायकसभी सामूहिक कार्यों की सफलता के लिये निर्देशन आवश्यक है। दुनिया में जहाँ कहीं भी दो या अधिक व्यक्ति मिलकर कार्य करते हैं, निर्देशन की आवश्यकता पड़ती है। निर्देशन के बिना सामूहिक कार्यों में सफलता प्राप्त करना कठिन नहीं, बल्कि असम्भव भी है। इसीलिए निर्देशन को एक सार्वभौमिक कार्य (Universal function) कहा जाता है।
14. प्रभावी सम्प्रेषण व्यवस्था में सहायकनिर्देशन से प्रभावी सम्प्रेषण व्यवस्था होती है। इसका कारण यह है कि इसमें सम्प्रेषण एकमार्गीय होता है। इसके अतिरिक्त कर्मचारियों की प्रकृति, व्यवहार एवं गुण को देखते हुए निर्देशन दिया जाता है, जिससे उनका अक्षरशः पालन होता है।

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