Question
वह वसुधैव बना कुटुंबकम्

Answer

स्वप्रयत्न

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हम हैं नवयुग के अग्रदूत
हम काल-जलधि-नाविक अभूत
हम साम्य-दीप के नव प्रकाश
हम विजयोन्मादी क्रान्ति पूत
हे प्रदीप्त गतिमान!
जागो और जगाओ।
चिड़िया, तोते, कोयल, मैना, सबको ही यह अति प्यारा था।
महाराज, यह ही कुरूप तरु, शोभा में सबसे न्यारा था ॥
मैं जन्मा हूँ इस पर, जब इसकी शोभा थी नई-निराली।
अतः मुझे प्राणों से भी प्यारी है इसकी डाली-डाली ॥
किंतु आह, कुछ दिन पहले आया वन में एक शिकारी।
उसके विष से बुझे बाण ने इस पर ढा दी आफत भारी ॥
विष के कारण सूख रहा है तब से यह तरुवर दिन-प्रतिदिन।
अब तो इसके साथ-साथ ही मेरा भी होगा अंतिम क्षण ॥
जीव क्या है ब्रह्म क्या?
तू कौन है, मैं कौन हूँ?
स्लेट पर लिख दो महोदय
आजकल मैं मौन हूँ,
धर्मसंकट शीघ्र ही
इस युक्ति से कट जाएँगे।
सामने से तार्किक विद्वान
हम जलती आग बुझायेंगे
मानव संतोष जगायेंगे
हम ज्योति लिये उन्नति-पथ पर
अविरत बढ़ते ही जायेंगे
हे जन गौरव प्राण!
जागो और जगाओ।
मानुष हौं तो वही 'रसखान', बसौं मिलि गोकुल गाँव के ग्वारन ।      जो पसु हौं तो कहा बस मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मँझारन॥     पाहन हौं तो वही गिरि को, जो धर्यो कर छत्र पुरंदर कारन।     जो खग हौँ तो बसेरो करौं मिलि कालिंदी-कूल कदंब की डारन॥

सुनो भाइयो, तुम्हें सुनाते, आज एक प्राचीन कहानी।
जो है अति सुंदर, अति अद्भुत, सचमुच कहानियों की रानी ॥
पुण्यभूमि काशी की महिमा, चारों दिशि में थी अति गुंजित।
देवों सहित देवपति उसको, लखकर होते थे अति हर्षित ॥
जा दिन तै वह नंद को छोहरो, या बन धेनु चराइ गयो है।       मोहिनी ताननि गोधन गाइकै, बेनु बजाइ रिझाइ गयो है ॥      ताही घरी कछु टोना सो कै, 'रसखान' हिये में समाइ गयो है।      कोऊ न काहू की कानि करै, सिगरो ब्रज बीर बिकाइ गयो है ॥
नगर से बाहर बगीचे में
बना लें झोंपड़ी
दीप जैसी देह चमके
सीप जैसी खोपड़ी
तर्क करने के लिये
आ जाए कोई सामने
खुल न जाए पोल इस
भय से लगें मत काँपने।
प्रभुजी तुम घन बन हम मोरा।
जैसे चितवत् चंद चकोरा।