वसन्त ऋतु-वसन्त को ऋतुराज कहा जाता है। इस ऋतु के आगमन से शीत का प्रकोप शान्त हो जाता है; पेड़-पौधों में नव-जीवन का संचार होने लगता है। वसन्त-काल में न तो गर्मी रहती है, न सर्दी। मौसम एकदम गुलाबी हो जाता है। पेड़-पौधों में कोपलें आती हैं, कलियाँ एवं फूल खिल उठते हैं, पर्वतीय भूमि पर तो हजारों किस्म के फूल स्वयं ही खिल उठते हैं। रंगों का त्योहार होली, वसन्त पञ्चमी आदि के कारण जन-मानस में उल्लास छा जाता है। खेतों में चना-मटर पकने लगता है, गेहूँ-जौ की बालें पकने लगती हैं और सरसों के खेतों की पीली चादर सर्वत्र फैल जाती है।
बागों में आम पर बौर आ जाता है। वृक्ष नवीन पत्ते धारण कर शोभा को बिखेरने लगते हैं तो वनों में महुआ महकने लगता है। सारा वातावरण वासन्ती सुषमा से व्याप्त हो जाता है। दक्षिण की हवा मन्द-सुगन्ध बहती है, तो पूर्वा हवा का रुख भी मन्द रहता है। सभी जीवों, पशु-पक्षियों को भी वसन्त-ऋतु की मादकता का आभास हो जाता है और सभी के मानस में उल्लास, उमंग, मस्ती एवं मचलने की इच्छा समाई रहती है। वसन्त के आगमन से सब कुछ बदलकर नया हो जाता है।