समुझी बात कहत मधुकर के, समाचार सब पाए।
इक अति चतुर हुते पहिलैं ही, अब गुरु ग्रंथ पढ़ाए।
बढ़ी बुद्धि जानी जो उनकी, जोग-सँदेस पठाए।
ऊधौ भले लोग आगे के, पर हित डोलत धाए।
अब अपनै मन फेर पाइहैं, चलत जु हुते चुराए।
ते क्यौं अनीति करें आपुन, जे और अनीति छुड़ाए।
राज धरम तौ यहै 'सूर', जो प्रजा न जाहिं सताए।
(क) गोपियाँ किसे 'मधुकर' कहकर संबोधित कर रही हैं?
(i) उद्धव को
(ii) श्रीकृष्ण को
(iii) भँवरे को
(iv) फूल को
(ख) 'बढ़ी बुद्धि जानी जो उनकी, जोग-सँदेस पठाए' -पंक्ति में किस पर व्यंग्य किया गया है?
(i) गोपियों पर
(ii) श्रीकृष्ण पर
(iii) उद्धव पर
(iv) भँवरे पर
(ग) गोपियाँ यह क्यों कहती हैं कि श्रीकृष्ण ने राजनीति पढ़ ली है?
(i) श्रीकृष्ण पहले से ही चतुर थे।
(ii) उन्होंने योग-संदेश भेजकर राजनीतिज्ञों की शैली को अपनाया।
(iii) उनकी कथनी और करनी में अंतर आ गया।
(iv) उपर्युक्त सभी ।
(घ) पहले के लोग कैसे थे?
(i) वे धनी थे।
(ii) वे आलसी थे।
(iii) वे दूसरों का भला करते थे।
(iv) वे किसी से कुछ नही कहते थे।
(ङ) गोपियाँ श्रीकृष्ण को राजा का कौन-सा कर्तव्य याद दिलाती हैं?
(i) राजा प्रजा को समझाए।
(ii) राजा प्रजा से बातचीत करे ।
(iii) राजा प्रजा की बात सुने ।
(iv) राजा प्रजा को न सताए।