मेरा त्राण करो अनुदिन तुम यह मेरी प्रार्थना नहीं
बस इतना होवे (करुणायम)
तरने की हो शक्ति अनामय।
मेरा भार अगर लघु करके न दो सांत्वना नहीं सही।
केवल इतना रखना अनुनय-
वहन कर सकूँ इसको निर्भय।
नत शिर होकर सुख के दिन में
तव मुख पहचानूँ छिन-छिन में।
दुःख-रात्रि में करे वंचना मेरी जिस दिन निखिल मही
उस दिन ऐसा हो करुणामय,
तुम पर करूँ नहीं कुछ संशय।।
प्रश्न 1. कवि ईश्वर से क्या चाहता है?
(क) निर्भीकता
(ख) भार वहन करने की शक्ति
(ग) भार हलका करना
(घ) सांत्वना
प्रश्न 2. “नत शिर” का क्या अर्थ है-
(क) अहंकार से सिर उठाकर
(ख) सिर ऊँचा करके
(ग) झुककर
(घ) सिर झुका कर
प्रश्न 3. “तव मुख पहचानूँ छिन-छिन में” से कवि का क्या भाव है?
(क) सुख के दिनों में भी सदा ईश्वर को याद करता रहूं।
(ख) विपत्ति आने पर पल-पल ईश्वर को याद करू।
(ग) दुख के दिनों में ईश्वर को याद करता रहूं।
(घ) सुख के दिनों में ईश्वर को न याद करूँ।
प्रश्न 4. कवि सुख के दिनों में क्या कामना करता है?
(क) कवि सुख के दिनों में हर क्षण प्रभु को याद रखना चाहता है।
(ख) कवि सुख के दिनों में हर क्षण सुख भोगना चाहता है।
(ग) वह सुख के क्षणों को बनाए रखे
(घ) कवि सुख के दिनों में सुख कम न होने की कामना करता है।
प्रश्न 5. “निखिल मही” से यहाँ तात्पर्य है-
(क) कवि के सगे-संबंधी
(ख) पृथ्वी के अन्य प्राणी
(ग) संपूर्ण संसार
(घ) उसके अपने कर्म
बस इतना होवे (करुणायम)
तरने की हो शक्ति अनामय।
मेरा भार अगर लघु करके न दो सांत्वना नहीं सही।
केवल इतना रखना अनुनय-
वहन कर सकूँ इसको निर्भय।
नत शिर होकर सुख के दिन में
तव मुख पहचानूँ छिन-छिन में।
दुःख-रात्रि में करे वंचना मेरी जिस दिन निखिल मही
उस दिन ऐसा हो करुणामय,
तुम पर करूँ नहीं कुछ संशय।।
प्रश्न 1. कवि ईश्वर से क्या चाहता है?
(क) निर्भीकता
(ख) भार वहन करने की शक्ति
(ग) भार हलका करना
(घ) सांत्वना
प्रश्न 2. “नत शिर” का क्या अर्थ है-
(क) अहंकार से सिर उठाकर
(ख) सिर ऊँचा करके
(ग) झुककर
(घ) सिर झुका कर
प्रश्न 3. “तव मुख पहचानूँ छिन-छिन में” से कवि का क्या भाव है?
(क) सुख के दिनों में भी सदा ईश्वर को याद करता रहूं।
(ख) विपत्ति आने पर पल-पल ईश्वर को याद करू।
(ग) दुख के दिनों में ईश्वर को याद करता रहूं।
(घ) सुख के दिनों में ईश्वर को न याद करूँ।
प्रश्न 4. कवि सुख के दिनों में क्या कामना करता है?
(क) कवि सुख के दिनों में हर क्षण प्रभु को याद रखना चाहता है।
(ख) कवि सुख के दिनों में हर क्षण सुख भोगना चाहता है।
(ग) वह सुख के क्षणों को बनाए रखे
(घ) कवि सुख के दिनों में सुख कम न होने की कामना करता है।
प्रश्न 5. “निखिल मही” से यहाँ तात्पर्य है-
(क) कवि के सगे-संबंधी
(ख) पृथ्वी के अन्य प्राणी
(ग) संपूर्ण संसार
(घ) उसके अपने कर्म