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गध्यांश पर आधारित (7M)

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Question 17 Marks
समय परिवर्तनशील है। जो आज हमारे साथ नहीं है कल हमारे साथ होगा ओर हम अपने दु ख ओर असफलता से मुक्ति पा लेंगे यह विचार ही हमें सहजता प्रदान कर सकता है। हम दूसरे की सम्पन्नता, ऊँचा पद ओर भोतिक साधनों की उपतश्धता देखकर विचलित हो जाते हैं कि यह उसके पास तो हे किन्तु हमारे पास नहीं हे। यह हमारे विचारों की गरीबी का प्रमाण हे ओर यही बात अन्दर विकट असहज भाव का संचालन करती है। जीवन में सहजता का भाव न होने के वजह से अधिकतर लोग हमेशा ही असफल होते हैं। सहज भाव लाने के लिए हमें एक तो नियमित रूप से योगासन-प्राणायाम ओर ध्यान करने के साथ ईश्वर का स्मरण अवशय करना चाहिए। इसमें हमारे तन-मन ओर विचारों के विकार बाहर निकलते हैं ओर तभी हम सहजता के भाव का अनुभव कर सकते हैं। याद रखने की बात है कि हमारे विकार ही अन्दर हैं। ईर्ष्या -द्वेष ओर परनिंदा जैसे दुगुर्ण हम अनजाने में ही अपना लेते हैं ओर अंततः जीवन में हर पल असहज होते हैं ओर उससे बचने के लिए आवश्यक है कि हम आध्यात्म के प्रति अपने मन ओर विचारों का रुझान रखें।

1. अधिकतर लोग हमेशा ही असफल क्यों होते हैं?
(क) जीवन में सहजता का भाव न होने के कारण
(ख) आध्यात्म के प्रति रुझान न होने के कारण
(ग) गरीबी के कारण
(घ) सम्पन्नता, ऊँचा पद ओर भोतिक साधनों की उपलब्थता के कारण

2. असहजता से बचने का क्या उपाय है?
(क) ईर्ष्या -द्वेष ओर परनिंदा को छोड़कर
(ख) योगासन-प्राणायाम और ध्यान करके
(ग) अधिक धन कमाकर
(घ) आध्यात्म के प्रति रुझान रखकर

3. कौन से विचार हमें सहजता प्रदान कर सकते हैं?
(क) आध्यात्मिक विचार
(ख) परनिंदा के विचार
(ग) धन अर्जन के विचार
(घ) स्वस्थ शरीर के विचार

4. विचारों की गरीबी से लेखक का क्या अभिप्राय हे?
5. हम सहजता का विकास कैसे कर सकते हैं?
Answer
1. (क) जीवन में सहजता का भाव न होने की वजह से अधिकतर लोग हमेशा ही असफल होते हैं अर्थात हमें अपनी स्थिति से संतुष्ट होना चाहिए।
2. (घ) हम आध्यात्म के प्रति अपने मन और विचारों का रुझान रख कर दूसरों के प्रति ईर्ष्या आदि से मुक्त हो सकते हैं ओर इस तरह असहजता से बच सकते हैं।
3. (क) आज हमारे साथ नहीं है कल हमारे साथ होगा अर्थात यदि हमारे मन में धेर्य ओर संयम का वास होगा तो हम अपने दु ख ओर असफलता से मुक्ति पा लेंगे यह विचार ही हमें सहजता प्रदान कर सकता है।
4. दूसरे की सम्पन्नता, ऊँचा पद ओर भोतिक साधनों की उपलब्धि अर्थात सम्पन्नता को देखकर अपना आत्मसंयम खो देना, उनसे ईर्ष्या रखना तथा यह सोचना कि यह उसके पास तो है लेकिन हमारे पास नहीं हैं, ऐसे तुच विचारों को मन में लाना ही विचारों की गरीबी है।
5. सहजता के विकास के लिए हमें नियमित रुप से योगासन, प्राणायाम ओर ध्यान करना चाहिए साथ ही ईश्वर का स्मरण भी अवश्य करना चाहिए। इससे हमारे तन-मन और विचारों में संयम आएगा ओर विकार बाहर निकलेंगे जिससे हम सहजता का अनुभव कर सकते हैं।
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Question 27 Marks
मैं यह नहीं मानता कि समृद्धि ओर आध्यात्म एक-दूसरे के विरोधी हैं या भौतिक वस्तुओं की इच्छा रखना कोई गलत सोच है। उदाहरण के तोर पर, में खुद न्यूनतम वस्तुओं का भोग करते हुए जीवन बिता रहा हूँ, लेकिन में सर्वन्र समृद्धि की कद्र करता हूँ, क्योंकि समृद्धि अपने साथ सुरक्षा तथा विश्वास लाती है, जो अंततः हमारी आज़ादी को बनाए रखने में सहायक है। आप अपने आस-पास देखेंगे तो पाएँगे कि खुद प्रकृति भी कोई काम आधे-अधूरे मन से नहीं करती। किसी बगीचे में जाइए। मोसम में आपको फूलों की बहार देखने को मिलेगी। अथवा ऊपर की तरफ ही देखें, यह ब्रहाण्ड आपको अनंत तक फेला दिखाई देगा, आपके यकीन से भी परे। जो कुछ भी हम इस संसार में देखते हैं वह ऊर्जा का ही स्वरूप है। जेसा कि महर्षि अरविंद ने कहा है कि हम भी ऊर्जा के ही अंश हैं। इसलिए जब हमने यह जान लिया है कि आत्मा ओर पदार्थ दोनों ही अस्तित्व का हिस्सा हैं, वे एक-दूसरे से पूरा तादात्य रखे हुए हैं तो हमें यह एहसास भी होगा कि भोतिक पदार्थों की इच्छा रखना किसी भी दृष्टिकोण से शर्मनाक या गेर-आध्यात्मिक बात नहीं है।

1. लेखक के अनुसार समृद्धि और आध्यात्म में क्या सम्बन्ध है?
(क) एक-दूसरे के विरोधी हैं
(ख) एक-दूसरे के पूरक हैं
(ग) एक-दूसरे से संबंधित नहीं हैं
(घ) समृद्धि, आध्यात्म से बेहतर है
2. भोतिक शब्द का विलोम शब्द क्या है?
(क) अभौतिक
(ख) सांसारिक
(ग) ईश्वरीय
(घ) स्थूल
3. समृद्धि को आवश्यक क्यों बताया गया है?
(क) समृद्धि अपने साथ सुरक्षा तथा विश्वास लाती है
(ख) समृद्धि हमारी आज़ादी को बनाए रखने में सहायक है
(ग) समृद्धि ओर आध्यात्म एक-दूसरे के पूरक हैं
(घ) उपरोक्त सभी
4. भौतिक वस्तुओं की इच्छा के बारे में लेखक का क्या मत है?
5. लेखक ने प्रकृति का क्या स्वभाव बताया है?
Answer
1. (ख) लेखक के अनुसार समृद्धि और आध्यात्म एक दूसरे के विरोधी न होकर एक-दूसरे के पूरक हैं।
2. (क) अभौतिक
3. (घ) समृद्धि प्राप्त होने पर मनुष्य अपने आप को सुरक्षित महसूस करता है तथा उसमें विश्वास का प्रसार होता है, जो अंततः हमारी आजादी को बनाए रखने में सहायक है इसलिए सर्वत्र समद्धि होने को आवश्यक माना गया है।
4. लेखक भोतिक वस्तुओं की इच्छा को गलत नहीं मानता। आत्मा ओर पदार्थ दोनो ही अस्तित्व का हिस्सा हैं व एक दूसरे से तालमेल रखते हैं और अध्यात्म के पूरक हैं अतः भोतिक पदार्थों की इच्छा रखना किसी भी हृष्टिकोण से शर्मनाक या गेर- आध्यात्मिक बात लेखक को नहीं लगती।
5. लेखक ने प्रकृति के स्वभाव के बारे में बताया है कि उसके द्वारा कोई भी काम आधे-अधूरे मन से नहीं किया जाता। उपयुक्त मोसम में बगीचे में फूलों की बहार दिखती है तो ऊपर देखने पर हमें ब्रह्माण्ड अनंत तक विस्तृत दिखाई देता हे। प्रकृति उद्दाम और खुलकर कार्य करती है उसमें कहीं कहीं कोई कमी दिखाई नहीं देती।
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