परीक्षा संकट में फंसा वेचारा विद्यार्थी
विद्यार्थी ओर परीक्षा दोनी में घनिष्ठ संबंध हे क्योंकि विद्यार्थी जीवन परीक्षा के बिना पूर्ण नहीं होता। बोर्ड की परीक्षाएँ शुरू होने वाली थी गोविन्द का बुरा हाल था पूरा साल तो उसने मोज-मस्ती में बिता दिया था एक महीने बाद क्या होगा। पापा ने उसका टाईमटेबल बना दिया था घर से निकलने की मनाही थी, मम्मी को भी उसपर नजर रखने का सख्त आदेश था, मोबाइल की घंटी बंद कर दी गई थी। बेचारा गोविन्द उसका तो बुरा हाल था, कुर्सी पर बेठ कर लगातार पढ़ाई करना उसको दिन में ही तारे दिखा रहा था। गणित के सवाल, इतिहास के प्रश्नों की खिचड़ी उसके दिमाग में पक रही थी। पढ़ाई करने में उसका मन नहीं लग रहा था उसे लग रहा था कि वह अच्छे नंबरों से तो दूर बोर्ड परीक्षा उत्तीर्ण ही नहीं कर पायेगा। तभी बगल के कमरे से उसे पापा की आवाज सुनाई दी जो फोन पर दादाजी से बात करते हुए उन्हें बता रहे थे कि गोविन्द कितनी लगन से पढ़ाई कर रहा है ओर उनको विश्वास था कि गोविन्द के अच्छे नंबर अवश्य आयेंगे, पापा के इस विश्वास ने बेचारे गोविन्द को इस परीक्षा संकट का सामना करने के लिए तेयार कर दिया था।