सामाजिक प्रभाव और दबाव की उपेक्षा कर साहित्यकार एक कदम भी आगे नहीं चल सकता और यदि चलता भी है, तो आवश्यक नहीं कि साहित्य पर समाज का यह प्रभाव सदैव अनुकूल हो। वह प्रतिकूल भी हो सकता है। कबीर की साखियों तथा प्रेमचंद के कथा साहित्य के अध्ययन से यही बात स्पष्ट होती है। कबीर ने अपने समय के धार्मिक बाह्याडंबरों, सामाजिक कुप्रवृत्तियों, रूढ़ियों एवं खोखली मान्यताओं के विरोध में अपना स्वर बुलंद किया। निराला के साहित्य में ही नहीं, उनके व्यक्तिगत जीवन में भी यही संघर्ष बराबर बना रहा। प्रेमचंद की कहानियों और उपन्यासों में सर्वत्र किसी-न-किसी सामाजिक समस्या के प्रति उनकी गहरी संवेदना दिखाई देती है। अस्तु साहित्यकार अपने युग तथा समाज के प्रभाव से अपने को अलग भी रखना चाहे, तो कदापि नहीं रख सकता।
साहित्य समाज का दर्पण होता है, किंतु इस कथन का आशय यह नहीं है कि साहित्यकार समाज का फोटोग्राफर है और सामाजिक विद्रूपताओं, कमियों, दोषों, अंधविश्वासों और मान्यताओं का यथार्थ चित्रण करना उसका उद्देश्य होता है। साहित्यकार का दायित्व वस्तुस्थिति का यथातथ्य चित्रण मात्र प्रस्तुत कर देना ही नहीं, उसके कारणों का विवेचन करते हुए श्रेयस मार्ग की ओर तक ले जाना है। साहित्य युग और समाज का होकर भी युगांतकारी जीवन मूल्यों की प्रतिष्ठा कर सुंदरतम समाज का जो भी रूप हो सकता है, उसका रेखाचित्र प्रस्तुत करता है। उसमें रंग भरकर जीवंतता प्रदान कर देना पाठकों एवं सामाजिकों का कार्य होता है। इस प्रकार जीवन के शाश्वत मूल्यों की प्रतिष्ठा करने से साहित्यकार एक देशीय होकर भी सार्वदेशिक होता है।
(i) साहित्य पर समाज का प्रभाव होता है-
(क) अनुकूल
(ख) मनोनुकूल
(ग) प्रतिकूल
(घ) अनुकूल अथवा प्रतिकूल
(ii) गद्यांश में कबीरदास जी की किस रचना का उल्लेख किया गया है?
(क) साखी
(ख) सबद
(ग) रमैनी
(घ) दोहा
(iii) धार्मिक आडंबरों, कुप्रवृत्तियों, रूढ़ियों इत्यादि के विरोध में किसने आवाज़ उठाई ?
(क) प्रेमचंद
(ख) निराला
(ग) कबीर
(घ) बिहारी
(iv) कबीर की साखियों तथा प्रेमचंद के कथा साहित्य के अध्ययन से कौन-सी बात स्पष्ट होती है?
(v) लेखक ने कबीर, निराला एवं प्रेमचंद जैसे साहित्यकारों की रचनाओं की किन विशेषताओं का उल्लेख किया है?
साहित्य समाज का दर्पण होता है, किंतु इस कथन का आशय यह नहीं है कि साहित्यकार समाज का फोटोग्राफर है और सामाजिक विद्रूपताओं, कमियों, दोषों, अंधविश्वासों और मान्यताओं का यथार्थ चित्रण करना उसका उद्देश्य होता है। साहित्यकार का दायित्व वस्तुस्थिति का यथातथ्य चित्रण मात्र प्रस्तुत कर देना ही नहीं, उसके कारणों का विवेचन करते हुए श्रेयस मार्ग की ओर तक ले जाना है। साहित्य युग और समाज का होकर भी युगांतकारी जीवन मूल्यों की प्रतिष्ठा कर सुंदरतम समाज का जो भी रूप हो सकता है, उसका रेखाचित्र प्रस्तुत करता है। उसमें रंग भरकर जीवंतता प्रदान कर देना पाठकों एवं सामाजिकों का कार्य होता है। इस प्रकार जीवन के शाश्वत मूल्यों की प्रतिष्ठा करने से साहित्यकार एक देशीय होकर भी सार्वदेशिक होता है।
(i) साहित्य पर समाज का प्रभाव होता है-
(क) अनुकूल
(ख) मनोनुकूल
(ग) प्रतिकूल
(घ) अनुकूल अथवा प्रतिकूल
(ii) गद्यांश में कबीरदास जी की किस रचना का उल्लेख किया गया है?
(क) साखी
(ख) सबद
(ग) रमैनी
(घ) दोहा
(iii) धार्मिक आडंबरों, कुप्रवृत्तियों, रूढ़ियों इत्यादि के विरोध में किसने आवाज़ उठाई ?
(क) प्रेमचंद
(ख) निराला
(ग) कबीर
(घ) बिहारी
(iv) कबीर की साखियों तथा प्रेमचंद के कथा साहित्य के अध्ययन से कौन-सी बात स्पष्ट होती है?
(v) लेखक ने कबीर, निराला एवं प्रेमचंद जैसे साहित्यकारों की रचनाओं की किन विशेषताओं का उल्लेख किया है?