कुसंगति का फल
देवनगर में गोपालदास नाम के एक सज्जन रहते थे। उनका पुत्र अमित बहुत गुणवान था। पढ़ाई, खेल-कूद और अन्य प्रवृत्तियों में वह हमेशा आगे रहता था। दुर्भाग्य से अमित बुरी संगति में फंस गया। पढ़ाई-लिखाई के प्रति भी वह लापरवाह हो गया। पुत्र की यह दुर्दशा देखकर माता-पिता बहुत चिंतित हुए। उन्होंने कई बार अमित को समझाने की कोशिश की, लेकिन उस पर कोई असर नहीं हुआ। एक दिन गोपालदास बाजार से टोकरी भर आम ले आए। साथ में वे एक सड़ा आम भी लाए। उन्होंने बेटे को बुलाकर कहा, “बेटा, लो, यह सड़ा हुआ आम भी इन आमों के बीच में रख दो। कल हम ये आम खाएंगे।“ पिता के कहने पर लड़के ने अन्य आमों के बीच वह सड़ा आम भी रख दिया। दूसरे दिन पिताजी ने अमित से कहा, “बेटा, आमोंवाली यह टोकरी ले आओ।“ पुत्र ने आमों की टोकरी खोलकर देखा तो उसमें और भी कई आम सड़ गए थे। ने कहा, “पिताजी, इसमें तो बहुत-से आम सड़ गए हैं। गोपालदास ने कहा, “हां बेटा! देखो, एक सड़े आम की संगति से दूसरे आम भी सड़ गए। तू खराब लड़कों की संगति में रहता है क्या तेरा जीवन भी इन आमों की तरह बरबाद नहीं हो जाएगा ?” पिताजी की बात सुनकर अमित की आँखें खुल गईं। उसी दिन से उसने बुरे साथियों का संग छोड़ दिया।
सीख : बुरी संगति का परिणाम बुरा होता है। बुरे साथियों से दूर रहने में
ही हमारी भलाई है।