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क्या निराश हुआ जाए question types

62 questions across 7 question groups — pick any mix to generate a Hindi paper with step-by-step answer keys.

62
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Sample Questions

क्या निराश हुआ जाए questions

One sample from each question group in this chapter. Select any group above to see the full set with answer keys.

केवल उन्हीं बातों का हिसाब रखो, जिनमें धोखा खाया है, तो............ 
  • A
    जीवन सुखमय हो जाएगा।
  • B
    जीवन सूना हो जाएगा।
  • जीवन कष्टकर हो जाएगा।

Answer: C.

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भारतवर्ष अब भी यह अनुभव कर रहा है कि$...........$
  • A
    कानून का आधार होना चाहिए।
  • धर्म कानून से बड़ी चीज है।
  • C
    धर्म कानून का ही रूप है।
  • D
    कानून ही सच्चा धर्म है।

Answer: B.

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बस में बैठे लोगों ने तरह-तरह की बातें शुरू कर दी। किसी ने कहा, "यहाँ डकैती होती है, दो दिन पहले इसी तरह एक बस को लूट लिया गया था।" परिवार सहित अकेला में ही था। बच्चे पानी-पानी चिल्ला रहे थे। पानी का कहीं ठिकाना न था। ऊपर से आदमियों का डर समा गया था। में भी बहुत भयभीत था, पर ड्राइवर को किसी तरह मार-पीट से बचाया। डेढ़-दो घंटे बीत गए। मेरे बच्चे भोजन और पानी के लिए व्याकुल थे। मेरी और मेरी पत्नी की हालत बुरी थी। लोगों ने ड्राइवर को मारा तो नहीं, पर उसे बस से उतार कर एक जगह घेर कर रखा। कोई भी दुर्घटना हाती है, तो पहले ड्राइवर को समाप्त कर देना उन्हें उचित जान पड़ा। ये गिड़गिडाने का कोई विशेष असर नहीं पड़ा। इसी समय क्या देखता हूँ कि एक खाली बस चली आ रही है और उस पर हमारा बस कंडक्टर भी बैठा हुआ है। उसने आते ही कहा, अड्‌डे से नई बस लाया हूँ, इस पर बैठिए। वह बस चलाने लायक नहीं है।" फिर मेरे पास एक लोटे में पानी और थोडा दूध लेकर आया और बोला, "पंडितजी। बच्चों का रोना मुझसे देखा नहीं गया। यहाँ दूध मिल गया, थोडा लेता आया।" यात्रियों में फिर जान आई। सबने उसे धन्यवाद दिया। ड्राइवर से माफी माँगी और बारह बजे से पहले ही सब लोग बस अड्डे पहुँच गए ।
Q.1. कंडक्टर के चले जाने का क्या प्रयोजन था ?
Q.2. यात्री के स्थान पर आप होते तो क्या करतें ?
Q.3. कंडक्टर का दूध और पानी लाने का प्रयोजन क्या था ?
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    मेरा मन कभी-कभी बैठ जाता है। समाचार पत्र में वगी, डकैती, चोरी, तस्करी और भ्रष्टाचार के समाचार भरे रहते हैं। आरोप-प्रत्यारोप का कुछ ऐसा वातावरण बन गया है कि लगता है, देश में कोई ईमानदार आदमी ही नहीं रह गया है। हर व्यक्ति संदेह की दृष्टि से देखा जा रहा है। जो जितने ही ऊँचे पद हैं, उनमें उतने ही अधिक दोष दिखाए जाते हैं। 
    एक बहुत बड़े आदमी ने मुझसे एक बार कहा था कि इस समय सुखी वही है, जो कुछ नहीं करता, जो कुछ भी करेगा, इसमें लोग दोष खोजने लगेंगे। उसके सारे गुण भुला दिए जाएँगे और दोषों को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जाने लगेगा। दोष किसमें नहीं होते? यही कारण है कि हर आदमी दोषी अधिक दीख रहा है. गुणी कम या बिल्कुल ही नहीं। स्थिति अगर ऐसी है. तो निश्चय ही चिन्ता का विषय है। 
     क्या यही भारतवर्ष है, जिसका सपना तिलक और गाँधी ने देखा था? रवीन्द्रनाथ ठाकुर और मदनमोहन मालवीय का महान् संस्कृत-सभ्य भारतवर्ष किसी अतीत के गह्वर में डूब गया? आर्य और द्रविड़, हिन्दू और मुसलमान, यूरोपीय और भारतीय आदर्शों की मिलनभूमि 'महामानव समुद्र' क्या सूख ही गया? मेरा मन कहता है, ऐसा हो नहीं सकता। हमारे महान मनीषियों के सपनों का भारत है और रहेगा।
प्रश्न :
Q.1. समाचार पत्रों में किन विषयों के समाचार भरे रहते हैं?
Q.2. ऊँचे पदों पर बैठे लोगों के बारे में क्या कहा गया है?
Q.3.  लेखक का मन क्या मानता है?
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    एक बार रेलवे स्टेशन पर टिकट लेते हुए गलती से मैंने दस के बजाय सौ रुपए का नोट दिया और मैं जल्दी-जल्दी गाड़ी में आकर बैठ गया। थोड़ी देर में टिकट बाबू उन दिनों के सेकंड क्लास के डिब्बे में हर आदमी का चेहरा पहचानता हुआ उपस्थित हुआ। उसने मुझे पहचान लिया और बड़ी विनम्रता के साथ मेरे हाथ में नब्बे रुपए रख दिए और बोला, "यह बहुत गलती हो गई थी। आपने भी नहीं देखा, मैंने भी नहीं देखा।" उनके चेहरे पर विचित्र संतोष की गरिमा थी। मैं चकित रह गया।
    कैसे कहूँ कि दुनिया में सच्चाई और ईमानदारी लुप्त हो गई है, वैसी अनेक अवांछित घटनाएँ भी हुई हैं, परंतु यह एक घटना दगी और वंचना की अनेक घटनाओं से अधिक शक्तिशाली है। 
    एक बार मैं बस-यात्रा कर रहा था। मेरे साथ मेरी पत्नी और तीन बच्चे भी थे, बस में कुछ खराबी थी, रुक-रुक कर चलती थी। गंतव्य से कोई पाँच मील पहले ही एक निर्जन सुनसान स्थान में बस ने जवाब दे दिया। रात के कोई दस बजे होंगे। बस में यात्री घबरा गए। कंडक्टर ऊपर गया और एक साइकिल लेकर चलता बना। लोगों को संदेह हो गया कि हमें धोखा दिया जा रहा है।
प्रश्न :
Q.1. टिकट बाबू ने लेखक को क्या लौटाया?
Q.2. टिकट बाबू के चेहरे पर कैसी भाव-भंगिमा थी?
Q.3. बस के रुक जाने पर यात्रियों को किस बात का संदेह हुआ?
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     भारतवर्ष सदा कानून को धर्म के रूप में देखता आ रहा है। आज एकाएक कानून और धर्म में अंतर कर दिया गया है। धर्म को धोखा नहीं दिया जा सकता, कानून को दिया जा सकता है। यही कारण है कि लोग धर्मभीरु हैं, वे कानून की त्रुटियों से लाभ उठाने में संकोच नहीं करते। 
     इस बात के पर्याप्त प्रमाण खोजे जा सकते हैं कि समाज के ऊपरी वर्ग में चाहे जो भी होता रहा हो, भीतर-भीतर भारतवर्ष अब भी यह अनुभव कर रहा है कि धर्म कानून से बड़ी चीज है। अब भी सेवा, ईमानदारी, सच्चाई और आध्यात्मिकता के मूल्य बने हुए हैं। वे दब अवश्य गए हैं, लेकिन नष्ट नहीं हुए। आज भी वह मनुष्य से प्रेम करता है, महिलाओं का सम्मान करता है, झूठ और चोरी को गलत समझता है, दूसरे को पीड़ा पहुँचाने को पाप समझता है। हर आदमी अपने व्यक्तिगत जीवन में इस बात का अनुभव करता है। समाचार पत्रों में जो भ्रष्टाचार के प्रति इतना आक्रोश है, वह यही साबित करता है कि हम ऐसी चीजों को गलत समझते हैं और समाज से उन तत्त्वों की प्रतिष्ठा कम करना चाहते हैं जो गलत तरीके से धन या मान संग्रह करते हैं। 
     दोषों का पर्दाफाश करना बुरी बात नहीं है। बुराई यह मालूम होती है कि किसी के आचरण के गलत पक्ष को उद्घाटित करते समय उसमें रस लिया जाता है और दोषोद्घाटन को एकमात्र कर्तव्य मान लिया जाता है। बुराई में रस लेना बुरी बात हैं, अच्छाई को उतना ही रस लेकर उजागर न करना और भी बुरी बात है। सैकड़ों घटनाएँ ऐसी घटती हैं, जिन्हें उजागर करने से लोक-चित्त में अच्छाई के प्रति अच्छी भावना जगती है।
प्रश्न :
Q.1. भारतवर्ष कानून को किस रूप में देखता आया है?
Q.2. समाज में अब भी कौन-कौन से मूल्य बने हुए हैं?
Q.3. बुराई में रस लेने की अपेक्षा और कौन-सी बात अधिक बुरी मानी गई है?
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