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अपठित गद्यांश question types

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अपठित गद्यांश questions

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भारत में प्राचीन काल में सभी धर्मों में सद्भाव था। सम्राट अशोक बौद्ध धर्म का अनुयायी था, परन्तु वह सभी धर्मों का समान आदर करता था। बादशाह अकबर इस्लाम-धर्मानुयायी होते हुए भी यहाँ के सभी धर्मों में समन्वय स्थापित करना चाहता था और वह फतेहपुर-सीकरी के 'दीवाने-खास' में सभी धर्मों के रहस्य जानने के लिए उनके आचार्यों से शास्त्रचर्चा करता था। भारतीय संस्कृति प्रारम्भ से ही सहिष्णु और उदार रही है। यहाँ हूण, मंगोल, तातार, यवन, ईसाई एवं पारसी आदि सभी धर्मों के लोग समय-समय पर बाहर से आये तथा वे यहीं के निवासी बन गये। अंति प्राचीन काल में आर्य और द्रविड़ लोगों में परस्पर मेल हुआ। इन सभी अवसरों पर भारतीयों ने सभी धर्मों को पर्याप्त आदर देकर सर्वधर्म-सद्भाव का परिचय दिया। भारतीय विद्वानों ने सभी धर्मों को सम्मान की दृष्टि से देखा। आधुनिक काल में तो गाँधीजी तथा अन्य मनीषियों ने भारत में सर्वधर्म सद्भाव पर अत्यधिक जोर दिया।
वस्तुतः यह मानवतावादी चिन्तन है। जब समाज में धार्मिक सद्भाव रहेगा या धार्मिक कट्टरता नहीं रहेगी, तो अन्धविश्वास और रूढ़ियाँ भी नहीं रहेंगी। जनता जितना आदर अपने धर्म को दे, उतना ही सम्मान अन्य धर्मों को भी दे। इससे समाज में सौमनस्य, समन्वय, एकता और सहयोग की भावना का प्रसार होगा। इससे मानवता की भावना बढ़ेगी और साम्प्रदायिकता का उन्माद दब जायेगा, उस दशा में इस धरती पर सच्चा ईश्वरीय राज्य स्थापित हो जाएगा। इस उपदेश का आशय यही है कि यदि मानव केवल मानवता अपनावे और मानव द्वारा कल्पित धर्मों का दुराग्रह छोड़ दे तथा धार्मिक कुत्सित कट्टरता न रखे तो तब सच्चे मानव-धर्म का प्रसार हो सकता है।

(i) सम्राट अशोक किस धर्म का अनुयायी था?
(अ) जैन धर्म
(ब) बौद्ध धर्म
(स) इस्लाम धर्म
(द) सनातन धर्म
(ii) ‘दीवाने-खास’ में कौन धार्मिक चर्चा करता था?
(अ) अशोक
(ब) गांधीजी
(स) अकबर
(द) चाणक्य
(iii) भारतीय संस्कृति की कौन-सी विशेषता प्राचीन काल से रही है?
(iv) गांधीजी ने आधुनिक काल में किस बात पर जोर दिया?
(v) यदि समाज में धार्मिक सद्भाव होगा, तो क्या समाप्त हो जाएगा?
(vi) मानवतावादी चिन्तन से समाज में क्या-क्या लाभ हो सकते हैं?
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भारतीय संस्कृति की पावन-परम्परा में नारी को सदैव सम्माननीय स्थान प्राप्त रहा है। वैदिक काल से नारी की प्रतिष्ठापना अर्धांगिनी के रूप में की गई है। नारी को सरस्वती, लक्ष्मी और दुर्गा का रूप माना जाता है। अतएव प्राचीन भारत में सर्वत्र नारी का देवी रूप पूज्य था। यज्ञ आदि अवसरों पर पुरुष के साथ नारी की उपस्थिति अनिवार्य मानी जाती थी।
उसके बिना कोई भी मांगलिक कार्य अधरा माना गया था। परन्त वैदिक काल से नारी की सामाजिक स्थिति में गिरावट आने लगी तथा उसका अस्तित्व घर की चहारदीवारी तक सीमित रहने लगा। इसी कारण नारी-जीवन को लेकर अनेक कुप्रथाओं और रूढ़ियों का प्रसार हुआ। उन्नीसवीं शताब्दी में जब भारत में ब्रिटिश साम्राज्य की स्थापना हुई, तब नारी की उस चिन्तनीय स्थिति में परिवर्तन आने लगा। ज्ञान-विज्ञान का प्रसार होने, नव-जागरण का स्वर उभरने से समाज-सुधारक महापुरुषों ने नारी-समाज के उत्थान के अनेक कार्य किये और नारी को जन-नेतृत्व का प्रशस्त पथ दिखाया।
स्वतन्त्रता-प्राप्ति के बाद हम यहाँ पर नारी के दो रूप देखते हैं, एक तो वे जो देहातों में रहती हैं, अशिक्षित एवं गरीब हैं और मेहनत-मजदूरी करके पीड़ित जीवन बिताती हैं तथा दूसरी वे जो शहरों-कस्बों में रहती हैं, शिक्षित, सम्पन्न एवं समर्थ हैं। देहातों की अशिक्षित नारी में प्राचीन नारी के संस्कार देखने को मिलते हैं। भले ही शिक्षा के अभाव से वह अभी भी सामाजिक कुरीतियों से ग्रस्त है। शहरों की नारियाँ शिक्षित होने का दम्भ रखकर सारे सामाजिक बन्धनों को तोड़ चुकी हैं। वे भौतिकता की चकाचौंध में नारी के प्राचीन आदर्शों को भूल गई हैं।

(i) नारी को वैदिक काल में किस रूप में प्रतिष्ठित किया गया है?
(अ) माता
(ब) बहन
(स) अर्धांगिनी
(द) दासी
(ii) प्राचीन भारत में नारी को किस रूप में पूजा गया था?
(अ) सेविका
(ब) देवी
(स) शिक्षिका
(द) वीरांगना
(iii) वैदिक काल के बाद नारी की सामाजिक स्थिति में क्या परिवर्तन आया?
(iv) स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद नारी के कितने रूप देखे जाते हैं?
(v) नारी के प्राचीन आदर्शों को कौन भूल चुकी हैं?
(vi) प्राचीन काल और आधुनिक काल की नारी की स्थिति में क्या अंतर है?
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श्रद्धा एक सामाजिक भाव है, इससे अपनी श्रद्धा के बदले में हम श्रद्धेय से अपने लिए कोई बात नहीं चाहते। श्रद्धा धारण करते हुए हम अपने को उस समाज में समझते हैं जिसके अंश पर - चाहे हम व्यष्टि रूप में उसके अन्तर्गत न भी हों-जान-बूझकर उसने कोई शुभ प्रभाव डाला। श्रद्धा स्वयं ऐसे कर्मों के प्रतिकार में होती है, जिसका शुभ प्रभाव अकेले हम पर ही नहीं, बल्कि सारे मनुष्य समाज पर पड़ सकता है। श्रद्धा एक ऐसी आनन्दपूर्ण कृतज्ञता है, जिसे हम केवल समाज के प्रतिनिधि रूप में प्रकट करते हैं।
सदाचार पर श्रद्धा और अत्याचार पर क्रोध या घृणा प्रकट करने के लिए समाज ने प्रत्येक व्यक्ति को प्रतिनिधित्व प्रदान कर रखा है। यह काम उसने इतना भारी समझा है कि उसका भार सारे मनुष्यों को बाँट दिया है, दो-चार मानवीय लोगों के सिर पर नहीं छोड़ रखा है। जिस समाज में सदाचार पर श्रद्धा और अत्याचार पर क्रोध प्रकट करने के लिए जितने ही अधिक लोग तत्पर पाये जायेंगे, उतना ही वह समाज जागृत समझा जायेगा।
श्रद्धा की सामाजिक विशेषता एक इसी बात से समझ लीजिए कि जिस पर हम श्रद्धा रखते हैं उस पर चाहते हैं कि और लोग भी श्रद्धा रखें। पर जिस पर हमारा प्रेम होता है उससे और दस-पाँच आदमी प्रेम रखें। इसकी हमें परवाह क्या, इच्छा ही नहीं होती, क्योंकि हम प्रिय पर लोभवश एक प्रकार का अनन्य अधिकार या इजारा चाहते हैं।

(i) समाज ने प्रत्येक व्यक्ति को किन कार्यों के लिए प्रतिनिधित्व प्रदान किया है?
(अ) शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए
(ब) श्रद्धा और प्रेम के लिए
(स) सदाचार पर श्रद्धा और अत्याचार पर क्रोध प्रकट करने के लिए
(द) कला और संस्कृति के लिए
(ii) समाज ने इस कार्य का भार किसके ऊपर डाला है?
(अ) केवल बुद्धिजीवियों पर
(ब) दो-चार मानवीय लोगों पर
(स) नेताओं पर
(द) सारे मनुष्यों पर
(iii) ‘जागृत समाज’ किसे कहा गया है?
(iv) ‘प्रतिनिधित्व’ शब्द का अर्थ क्या है?
(v) जिन समाजों में लोग अत्याचार पर मौन रहते हैं, उन्हें कैसा माना जाएगा?
(vi) दिए गए अनुच्छेद के आधार पर स्पष्ट कीजिए कि एक जागृत समाज की क्या विशेषताएँ होती हैं?
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आज यदि आप संसार की सारी समस्याओं का विश्लेषण करें तो इनके मूल में एक ही बात पायेंगे—मनुष्य की तृष्णा। यह अद्भुत तृष्णा कहीं समाप्त होने का नाम नहीं लेती। मनुष्य में सर्वत्र अभाव भर गया है। जीवन की वह पूर्णता कम हो गई है जो मनुष्य को याचक न बनाकर दाता बनाती है। आज उत्पादन बढ़ाने की धूम है, जीवन का स्तर ऊँचा उठाने का संकल्प मुखर है, परन्तु जीवन में वह उच्छलित आनन्द कैसे आएगा जो मनुष्य को संयत, सन्तुष्ट और वदान्य बना सके, इसकी चिन्ता किसी को नहीं है।
हम भौतिक समृद्धि के प्रयत्नों को छोटा बनाने के उद्देश्य से यह बात नहीं कह रहे। उत्पादन बढ़ाना आवश्यक है, जीवन-स्तर को ऊँचा उठाने का प्रयत्न भी श्लाघ्य है, पर इतने से समस्या का हल नहीं हो जाता। तृष्णा वह आग है जिसके पेट में जितना भी झोंक दीजिए वह भस्म हो जाएगा। उस वस्तु की खोज होनी चाहिए जो मनुष्य को छोटे प्रयोजनों में बाँधने के बदले उसे प्रयोजनातीत सत्य की ओर उन्मुख करे। साहित्य और संगीत यही काम करते हैं, कला और सौन्दर्य उसे इसी ओर ले जाते हैं।
नितान्त उपयोगिता की दृष्टि से भी विचार किया जाए तो मनुष्य समाज की स्थिति के लिए-सभ्यता और संस्कृति की रक्षा के लिए ही यह आवश्यक हो गया है कि मनुष्य अपने उस महान् उन्नायक धर्म की उपेक्षा न करे जो क्षुद्रता और संकीर्णता से ऊपर उठाते हैं। भौतिक समृद्धि के बढ़ाने का प्रयत्न होना चाहिए पर उसे सन्तुलित करने के लिए साहित्य और संगीत आदि का भी बहुत प्रचार वांछनीय है।

(i) मनुष्य की सभी समस्याओं का मूल कारण क्या बताया गया है?
(अ) अशिक्षा
(ब) लालच
(स) तृष्णा
(द) असमानता
(ii) लेखक के अनुसार जीवन में किस बात की कमी हो गई है?
(अ) शिक्षा की
(ब) रोजगार की
(स) पूर्णता की
(द) समानता की
(iii) ‘तृष्णा वह आग है’ — इस पंक्ति का तात्पर्य क्या है?
(iv) लेखक के अनुसार मनुष्य को किस ओर उन्मुख होना चाहिए?
(v) साहित्य और संगीत का क्या कार्य बताया गया है?
(vi) लेखक ने भौतिक समृद्धि और साहित्य-संगीत में संतुलन की आवश्यकता क्यों बताई है?
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'संस्कृति' शब्द का सम्बन्ध संस्कार से है, जिसका अर्थ है-संशोधन करना, उत्तम बनाना, परिष्कार करना। संस्कार व्यक्ति के भी होते हैं और जाति के भी। जातीय संस्कारों को ही संस्कृति कहते हैं। संस्कृति एक समूह वाचक शब्द है। जलवायु के अनुकूल रहन-सहन की विधियाँ और विचार-परम्पराएँ जाति के लोगों में दृढमूल हो जाने से जाति के संस्कार बन जाते हैं।
इनको प्रत्येक व्यक्ति अपनी निजी प्रकृति के अनुकूल न्यूनाधिक मात्रा में पैतृक सम्पत्ति के रूप में प्राप्त करता है। ये संस्कार व्यक्ति के घरेलू जीवन तथा सामाजिक जीवन में परिलक्षित होते हैं। मनुष्य अकेला रहकर भी इनसे छुटकारा नहीं पा सकता। ये संस्कार दूसरे देश में निवास करने अथवा दूसरे देशवासियों के सम्पर्क में आने से कुछ परिवर्तित भी हो सकते हैं और कभी-कभी दब भी जाते हैं, किन्तु अनुकूल वातावरण प्राप्त करने पर फिर उभर आते हैं।
संस्कृति का बाह्य पक्ष भी होता है और आन्तरिक भी। उसका बाह्य पक्ष आन्तरिक प्रतिबिम्ब नहीं तो उससे सम्बन्धित अवश्य रहता है। हमारे बाह्य आचार हमारे विचारों और मनोवृत्तियों के परिचायक होते हैं। संस्कृति एक देश विशेष की उपज होती है, इसका सम्बन्ध देश के भौतिक वातावरण और उसमें पालित, पोषित एवं परिवर्द्धित विचारों से होता है। इसी कारण संस्कृति को जन का मस्तिष्क, राष्ट्र का तीसरा अंग और देश का श्वास-प्रश्वास माना जाता है। संस्कृति में ही जीवन का सौन्दर्य एवं यश अन्तर्निहित है।

(i) संस्कृति शब्द का अर्थ क्या है?
(अ) परम्परा
(ब) संस्कारों का संशोधन
(स) धर्म
(द) भाषा
(ii) संस्कृति को किसका 'तीसरा अंग' कहा गया है?
(अ) व्यक्ति
(ब) समाज
(स) राष्ट्र
(द) विचार
(iii) संस्कृति का कौन-सा पक्ष विचारों और मनोवृत्तियों से सम्बन्धित होता है?
(iv) व्यक्ति किन संस्कारों को पैतृक सम्पत्ति के रूप में प्राप्त करता है?
(v) मनुष्य अकेले रहकर भी किनसे छुटकारा नहीं पा सकता?
(vi) संस्कृति किन दो पक्षों में विभाजित होती है? दोनों के बीच क्या सम्बन्ध होता है?
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