Question types

अपठित कव्यांश question types

16 questions across 1 question group — pick any mix to generate a Hindi paper with step-by-step answer keys.

16
Questions
1
Question groups
5
Question types
Sample Questions

अपठित कव्यांश questions

One sample from each question group in this chapter. Select any group above to see the full set with answer keys.

हाय रे मानव, नियति के दास!
हाय रे मनुपुत्र, अपना ही उपहास!
प्रकृति की प्रच्छन्नता को जीत,
सिन्धु से आकाश तक सबको किये भयभीत,
सृष्टि को निज बुद्धि से करता हुआ परिमेय,
चीरता परमाणु की सत्ता असीम, अजेय,
बुद्धि के पवमान में उड़ता हुआ असहाय,
जा रहा तू किस दिशा की ओर को निरुपाय?
लक्ष्य क्या? उद्देश्य क्या? क्या अर्थ?
यही नहीं यदि ज्ञात तो विज्ञान का श्रम व्यर्थ।
सुन रहा आकाश चढ़ ग्रह-तारकों का नाद;
एक छोटी बात ही पड़ती न तुझको याद।
एक छोटी, एक सीधी बात,
विश्व में छायी हुई है वासना की रात।

(i) कविता में मानव को किसका दास कहा गया है?
(अ) बुद्धि का
(ब) विज्ञान का
(स) नियति का
(द) वासना का
(ii) कवि के अनुसार विज्ञान का श्रम कब व्यर्थ हो जाता है?
(अ) जब लक्ष्य न हो
(ब) जब बुद्धि का विकास न हो
(स) जब वासना की रात छा जाए
(द) जब मानव प्रकृति से डरे
(iii) कवि ने मानव को किस दिशा में जा रहा बताया है?
(iv) ‘सुन रहा आकाश चढ़ ग्रह-तारकों का नाद’ — इस पंक्ति में मानव की किस उपलब्धि का संकेत है?
(v) कविता के अनुसार विश्व में किसकी रात छायी हुई है?
(vi) कविता के अनुसार मानव की बुद्धि और विज्ञान की प्रगति के बावजूद कवि उसे क्यों असहाय मानता है?
View full solution
विचार लो कि मर्त्य हो न मृत्यु से डरो कभी,
मरो परन्तु यों मरो कि याद जो करें सभी।
हुई न यों सु-मृत्यु तो वृथा मरे, वृथा जिये,
मरा नहीं वही कि जो जिया न आपके लिए।
यही पशु-प्रवृत्ति है कि आप-आप ही चरे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।
उसी उदार की कथा सरस्वती बखानती,
उसी उदार से धरा कृतार्थ भाव मानती।
उसी उदार की सदा सजीव कीर्ति कूजती,
तथा उसी उदार को समस्त सृष्टि पूजती।
अखण्ड आत्मभाव जो असीम विश्व में भरे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।
सहानुभूति चाहिए, महाविभूति है यही,
वशीकृता सदैव है बनी हुई स्वयं मही॥

(i) मनुष्य होने का प्रमुख लक्षण क्या बताया गया है?
(अ) ज्ञान प्राप्त करना
(ब) धन कमाना
(स) दूसरों के लिए मरना
(द) स्वयं का पालन करना
(ii) ‘वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे’ – यह किस भावना को दर्शाता है?
(अ) स्वार्थ
(ब) प्रेम
(स) करुणा
(द) परोपकार
(iii) कविता के अनुसार ‘वृथा मरण’ किसे कहा गया है?
(iv) कविता में किसका वर्णन सरस्वती करती है?
(v) सहानुभूति को कविता में क्या कहा गया है?
(vi) कविता के आधार पर स्पष्ट कीजिए कि ‘उदार व्यक्ति’ को समाज में क्यों सम्मान मिलता है?
View full solution
सोचता हूँ, मैं कब गरजा था?
जिसे लोग मेरा गर्जन समझते हैं,
वह असल में गाँधी का था,
उस आँधी का था, जिसने हमें जन्म दिया था।
तब भी हमने गाँधी के
तूफान को ही देखा
गाँधी को नहीं।
वे तूफान और गर्जन के
पीछे बसते थे।
सच तो यह है
कि अपनी लीला में
तूफान और गर्जन को
शामिल होते देख
वे हँसते थे।

(i) गर्जन किसका था, जिसे लोग शेर का समझते थे?
(अ) शेर का
(ब) गाँधी का
(स) जनता का
(द) नेता का
(ii) कवि के अनुसार गाँधी कहाँ बसते थे?
(अ) जनता के मन में
(ब) तूफान और गर्जन के पीछे
(स) जंगल में
(द) संसद में
(iii) गाँधी ने तूफान और गर्जन को देखकर क्या किया?
(iv) लोग किसे शेर का गर्जन समझते थे?
(v) ‘तूफान’ और ‘गर्जन’ किनके प्रतीक हैं?
(vi) कविता में कवि ने गाँधी के व्यक्तित्व की कौन-सी विशेषताएँ बताई हैं?
View full solution
यवन को दिया दया का दान, चीन को मिली धर्म की दृष्टि।
मिला था स्वर्ण-भूमि को रत्न, शील की सिंहल को भी सृष्टि ॥
किसी का हमने छीना नहीं, प्रकृति का रहा पालना यहीं।
हमारी जन्मभूमि थी यही, कहीं से हम आये थे नहीं।
जातियों का उत्थान-पतन, आँधियाँ, झड़ी, प्रचण्ड समीर।
खड़े देखा, झेला हँसते, प्रलय में पले हुए हम वीर ॥
चरित थे पूत, भुजा में शक्ति, नम्रता रही सदा सम्पन्न।
हृदय के गौरव में था गर्व, किसी को देख न सके विपन्न॥
हमारे संचय में था दान, अतिथि थे सदा हमारे देव।
वचन में सत्य, हृदय में तेज, प्रतिज्ञा में रहती थी टेव।।
वही है रक्त, वही है देश, वही साहस है, वैसा ज्ञान।
वही है शान्ति, वही है शक्ति, वही हम दिव्य आर्य-सन्तान।।
जियें तो सदा उसी के लिए, यही अभिमान रहे, यह हर्ष।
निछावर कर दें हम सर्वस्व, हमारा प्यारा भारतवर्ष ॥

(i) भारत ने यवन को क्या दिया?
(अ) शस्त्र
(ब) विद्या
(स) दया का दान
(द) भूमि
(ii) श्रीलंका को भारत ने क्या प्रदान किया?
(अ) शक्ति
(ब) सृष्टि
(स) संपत्ति
(द) समृद्धि
(iii) भारतवासी किन्हें देव मानते थे?
(iv) कवि के अनुसार भारतवासी प्रलय में कैसे रहे?
(v) कवि को किस बात का गर्व है?
(vi) कविता के आधार पर यह सिद्ध कीजिए कि भारतवासी स्वाभिमानी और दयालु हैं।
View full solution
धन-बल से हो जहाँ न जन-श्रम-शोषण,
पूरित भव-जीवन के निखिल प्रयोजन!
जहाँ दैन्य जर्जर, अभाव ज्वर पीड़ित,
जीवन-यापन हो न मनुज को गर्हित
युग-युग के छायाभासों से त्रासित
मानव के प्रति मानव मन हो न सशंकित!
मुक्त जहाँ मन की गति, जीवन में रति,
भव-मानवता से जन-जीवन परिणति संस्कृति
वाणी, भाव, कर्म, संस्कृत मन,
सुन्दर हो जन वास, वसन सुन्दर तन!
ऐसा स्वर्ग धरा पर हो समुपस्थित,
नव मानव-संस्कृति किरणों से ज्योतित!

(i) कवि किस स्थान को “स्वर्ग धरा पर” बनाना चाहता है?
(अ) स्वर्गलोक
(ब) हिमालय
(स) भारत
(द) सम्पूर्ण पृथ्वी
(ii) कवि के अनुसार किस प्रकार का जीवन ‘गर्हित’ नहीं होना चाहिए?
(अ) ऐशो-आराम वाला
(ब) धर्मयुक्त
(स) मेहनत का
(द) जीवन-यापन का
(iii) कवि के अनुसार मनुष्य-मनुष्य के बीच क्या नहीं होना चाहिए?
(iv) कवि किस प्रकार की संस्कृति की ज्योति से मानव जीवन को आलोकित देखना चाहता है?
(v) कवि के अनुसार मानव जीवन की परिणति किससे होनी चाहिए?
(vi) कविता में कवि ने एक आदर्श समाज की कल्पना किस प्रकार की है?
View full solution

Generate a अपठित कव्यांश paper free

Pick question groups from the list above, set marks and difficulty, and export a branded PDF with step-by-step answer keys. First 3 chapters free — no signup.

Download App