हाय रे मानव, नियति के दास!
हाय रे मनुपुत्र, अपना ही उपहास!
प्रकृति की प्रच्छन्नता को जीत,
सिन्धु से आकाश तक सबको किये भयभीत,
सृष्टि को निज बुद्धि से करता हुआ परिमेय,
चीरता परमाणु की सत्ता असीम, अजेय,
बुद्धि के पवमान में उड़ता हुआ असहाय,
जा रहा तू किस दिशा की ओर को निरुपाय?
लक्ष्य क्या? उद्देश्य क्या? क्या अर्थ?
यही नहीं यदि ज्ञात तो विज्ञान का श्रम व्यर्थ।
सुन रहा आकाश चढ़ ग्रह-तारकों का नाद;
एक छोटी बात ही पड़ती न तुझको याद।
एक छोटी, एक सीधी बात,
विश्व में छायी हुई है वासना की रात।
(i) कविता में मानव को किसका दास कहा गया है?
(अ) बुद्धि का
(ब) विज्ञान का
(स) नियति का
(द) वासना का
(ii) कवि के अनुसार विज्ञान का श्रम कब व्यर्थ हो जाता है?
(अ) जब लक्ष्य न हो
(ब) जब बुद्धि का विकास न हो
(स) जब वासना की रात छा जाए
(द) जब मानव प्रकृति से डरे
(iii) कवि ने मानव को किस दिशा में जा रहा बताया है?
(iv) ‘सुन रहा आकाश चढ़ ग्रह-तारकों का नाद’ — इस पंक्ति में मानव की किस उपलब्धि का संकेत है?
(v) कविता के अनुसार विश्व में किसकी रात छायी हुई है?
(vi) कविता के अनुसार मानव की बुद्धि और विज्ञान की प्रगति के बावजूद कवि उसे क्यों असहाय मानता है?
हाय रे मनुपुत्र, अपना ही उपहास!
प्रकृति की प्रच्छन्नता को जीत,
सिन्धु से आकाश तक सबको किये भयभीत,
सृष्टि को निज बुद्धि से करता हुआ परिमेय,
चीरता परमाणु की सत्ता असीम, अजेय,
बुद्धि के पवमान में उड़ता हुआ असहाय,
जा रहा तू किस दिशा की ओर को निरुपाय?
लक्ष्य क्या? उद्देश्य क्या? क्या अर्थ?
यही नहीं यदि ज्ञात तो विज्ञान का श्रम व्यर्थ।
सुन रहा आकाश चढ़ ग्रह-तारकों का नाद;
एक छोटी बात ही पड़ती न तुझको याद।
एक छोटी, एक सीधी बात,
विश्व में छायी हुई है वासना की रात।
(i) कविता में मानव को किसका दास कहा गया है?
(अ) बुद्धि का
(ब) विज्ञान का
(स) नियति का
(द) वासना का
(ii) कवि के अनुसार विज्ञान का श्रम कब व्यर्थ हो जाता है?
(अ) जब लक्ष्य न हो
(ब) जब बुद्धि का विकास न हो
(स) जब वासना की रात छा जाए
(द) जब मानव प्रकृति से डरे
(iii) कवि ने मानव को किस दिशा में जा रहा बताया है?
(iv) ‘सुन रहा आकाश चढ़ ग्रह-तारकों का नाद’ — इस पंक्ति में मानव की किस उपलब्धि का संकेत है?
(v) कविता के अनुसार विश्व में किसकी रात छायी हुई है?
(vi) कविता के अनुसार मानव की बुद्धि और विज्ञान की प्रगति के बावजूद कवि उसे क्यों असहाय मानता है?