Question
ऐतिहासिक स्थान का प्रवास

Answer

शीतकाल की छुट्टीयो में पाठशाला की ओर से अजंता और दक्षिण भारत के प्रवास का आयोजन हुआ पाठ्यपुस्तकों में पढ़ा अजंता का विवरण मन को कल्पना की पंख पर उडा ले जा रहा था | आखिर यह शुभ घडी भी आ गई और हमने पूर्व सूचनानुसार तयारी कर ,रेलवे स्टेसन पर स्वजनों से विदा ले अजंता की ओर प्रस्थान किया ,हम उम्र सहपाठियो के हंसी विनोद में $20$-$22$ घंटे लम्बी रेलयात्रा कब समाप्त हुई ,कुछ पता नहीं न चला | औरंगाबाद में बस में बेठ हम ने फर्जारपुर नामक गाँव की ओर प्रस्थान किया जिस के निकट पहाडियों में जगविख्यात अजंता के लिए कला मंडप छिपे हुए है | हरियाली से आच्छादित प्रकृति की रम्य गोद में सरपट दोड़ती हुई हमारी बस आखिर नियत स्थान पर पहुंची | सर्पाकार बहती वघोरा नदी प्रवाह को पार कर हम ऊँचे टीले के पास आ गये जो $300$ सो फुट ऊँचा दीवार सा दिख रहा था | इसी के बिच बारहदारियो की क़तार सी अजन्ता की गुफाए हुई है |
मानव चहलपहल और शोरगुल से दूर एकांत में बनी हुई ये गुफाए बौद्ध साधको की साधनाभूमि थी , जिनका निर्माण आज से लगभग $1500$-$1700$ वर्ष पूर्व हुआ था | इतिहास ने फिर करवट बदली | शिकार का पिछा करते हुए एक अंग्रेज ने विश्व के इस अन्यतम कलाधाम को खोज निकाला था | सरकार ने मरम्मत सफाई की और भारत को शिल्प तथा चित्रकार के अद्वितीय नमूने उपलब्ध है |
अजन्ता की इन गुफाओं का प्रवेशद्वार बड़ा ही विशाल और कलात्मक है | यहाँ कुछ $29$ गुफाए है | वे दो पराक्र की है | प्राथना$-$उपासना के लिए बनी हुई स्तूप गुफाए और निवास के लिए बनी हुई विहार गुफाए | स्तूप गुफाए लम्बी है ,उनके अंतिम छोर पर स्तूप तथा दोनों ओर खम्भों की लम्बी कतारे बनी है | ये दोनों प्रकार की गुफाए ओर उनका सारा मूर्तिशिल्प एक ही पत्थर को काटकर बनाया हो | जो, कला की द्रष्टि से सर्वोत्क्रूष्ट है | दीवार के पत्थर को खुरदरा बना , उस पर गोबर पत्थर का चूर्ण ,भूसी का गारा लगा , ,उसे चुने से पलास्टर से ढँक कर लाल रेखाओ से टीपे गए इन चित्रों में यथावश्यक रंग से भरे गए है | जो सदियों के बाद आज भी जैसे बने दिखाई दे रहे है | इन चित्रों की रुपरेखा जोरदार ओर लोचदार है |
हाथकी मुद्राओ ,आँख की चितवनो और अंगो की लचक से चित्र के भाव व्यक्त किये गए है | अहम ,द्वेष,धृणा, क्रोध,अनुराग आदि मनोभावो का अंकन बड़ी सजीवता के साथ हुआ है | खम्भा , गोल ,महराबो, छतो और गर्भ मंदिरों पर खुदी पतली फुल पत्तियाँ वास्तविकता का भ्रम पैदा करती है |
यहाँ की अधिकांश गुफाए काल – कवलित हो चुकी है | जिन गुफाओं कलाकृतिया अब भी सुरक्षित है | उनमे विशेष उल्लेखनीय है गुफा नंबर $1,16$,और $17 $| पहली गुफा में मारविजय ,अवलोकितेश्वर ,चंपेय जातक आदि कथा पासंग चित्रित है | मार्विजय के विशाल फलकवाले चित्र में डरावने और लुभाने वाली मार सेना के बिच भगवान बुद्ध की मूर्ति शांत, आत्मलीन भाव में बिराजमान है | अवलोकितेश्वर नामक चित्र में त्रिभाग्युक्त भगवान् बुद्ध की मुद्रा करुना की भावना से ओतप्रोत है |
बोधिसत्व की विविध चर्चाओ का अंकन चंपेय जातक , छदन्त जातक, गज जातक , वेस्सेंतर जातक, सीवी जातक , महाहंश जातक आदि कथाचित्रों में बड़ी ही सफलता के साथ किया गया है | सोई हुई पत्नी और पुत्र को छोड़कर वैरागीभावसे बुद्ध के गृहत्याग तथा भिक्षा मांगते बुध्ह को पुत्रदान देती यशोधरा के चित्र बड़े ही मर्मस्पर्शी है | कहाँ तक वर्णन किया जाय एक एक चित्र कलाका उत्क्रूस्ट नमूना था | दिनभर इन कलाकृति यो का रसास्वाद लेते हुए विगत इतिहास में अवगाहन किया |

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