Question
निर्देशन के सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए।

Answer

निर्देशन के सिद्धान्त
अच्छा तथा प्रभावी निर्देशन प्रदान करना एक चुनौतीपूर्ण कार्य है क्योंकि इसमें बहुत-सी जटिलताएँ सम्मिलित हैं। निर्देशन के कुछ मार्गदर्शक सिद्धान्त हैं जो निर्देशन की प्रक्रिया में सहायक हो सकते हैं। इन सिद्धान्तों को निम्न प्रकार से समझाया जा सकता है-
1. अधिकतम व्यक्तिगत योगदान का सिद्धान्त-
निर्देशन का यह सिद्धान्त इस बात पर जोर देता है कि निर्देशन की तकनीकें सभी व्यक्तियों को संस्था में इस प्रकार सहायता दें कि वे अपनी सम्भावित क्षमताओं का अधिकतम योगदान सांगठनिक उद्देश्यों की पूर्ति में दे सकें और संस्था के कुशल निष्पादन के लिए कर्मचारियों की अप्रयुक्त ऊर्जा को उभार कर प्रयोग में ला सकें।
2. सांगठनिक उद्देश्यों में तालमेल का सिद्धान्त-यह सिद्धान्त यह बतलाता है कि अच्छा निर्देशन वही है जो व्यक्तिगत हितों तथा सामान्य हितों में तालमेल बिठाता है तथा कर्मचारियों को यह विश्वास दिलाता है कि कार्यकुशलता तथा पारिश्रमिक दोनों एकदूसरे के पूरक हैं।
3. आदेश की एकता का सिद्धान्त-निर्देशन का यह सिद्धान्त इस बात पर जोर देता है कि कर्मचारी को केवल एक ही उच्च अधिकारी से आदेश मिलने चाहिए। यदि आदेश एक से अधिक अधिकारियों से मिलते हैं, तो यह भ्रान्ति पैदा करते हैं तथा संस्था में द्वन्द्व तथा . अव्यवस्था फैलाते हैं।
4. निर्देशन तकनीकों की उपयुक्तता/औचित्ययह सिद्धान्त यह बतलाता है कि निर्देशन उपयुक्त अभिप्रेरक तथा नेतृत्व की तकनीकों का प्रयोग करते समय कर्मचारियों की आवश्यकताओं, योग्यताओं, उनके दृष्टिकोण तथा अन्य वस्तुस्थितियों को ध्यान में रखना चाहिए। कुछ व्यक्तियों के लिए पैसा एक सशक्त अभिप्रेरक का कार्य कर सकता है, दूसरी तरफ किसी के लिए पदोन्नति एक प्रभावी प्रेरक का कार्य करती है।
5. प्रबन्धकीय सम्प्रेषण का सिद्धान्त- यह सिद्धान्त यह बतलाता है कि संस्था के सभी स्तरों पर प्रभावी प्रबन्धकीय सम्प्रेषण निर्देशन को भी महत्त्वपूर्ण बनाता है। अधीनस्थों की सम्पूर्ण पारस्परिक समझ को बनाने के लिए निर्देशक को स्पष्ट अनुदेश/निर्देश जारी करने चाहिए। उपयुक्त प्रतिपुष्टि के द्वारा प्रबन्धकों को यह निश्चित कर लेना चाहिए कि अधीनस्थ उसके निर्देश को स्पष्ट रूप से समझ रहे हैं। . 6. अनौपचारिक संगठन का प्रयोग-प्रबन्धक को यह समझना चाहिए कि प्रत्येक औपचारिक संगठन के अन्तर्गत ही अनौपचारिक समूह तथा संगठन पाये जाते हैं। उसे उन्हें पहचान कर उन संगठनों का समुचित प्रयोग एक प्रभावी निर्देशन के लिए करना चाहिए।
7. नेतृत्व का सिद्धान्त-कर्मचारियों का निर्देशन करते समय प्रबन्धक को एक अच्छे नेतृत्व का प्रदर्शन करना चाहिए क्योंकि यह अधीनस्थों को बिना उनके बीच किसी असन्तोष की भावना से सकारात्मक रूप से प्रभावित करता है।
8. अनुसरण करना-निर्देशन के अन्तर्गत केवल आदेश देना ही पर्याप्त नहीं है। प्रबन्धक को निरन्तर पुनरीक्षण के द्वारा अनुसरण करना चाहिए कि उनके आदेशों का यथावत् पालन हुआ है कि नहीं अथवा उन्हें किन समस्याओं का सामना करना पड़ता है। यदि आवश्यक हो, तो उपयुक्त संशोधन/परिवर्तन इस दिशा में किये जाने चाहिए।

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