Question
सत की नाव खेवटिया सतगुरु भवसागर तरि आयो।

Answer

सच्चाई मनुष्य का सबसे बड़ा गुण है। यदि कोई व्यक्ति सच्चे मन से अपने आराध्य देव का ध्यान करे और उसे सद्गुरु का सहयोग प्राप्त हो, तो व्यक्ति को भवसागर से मुक्ति पाना कठिन नहीं है। मीरांबाई को अपने सद्गुरु पर अटूट विश्वास है। उनके लिए सद्गुरु की कृपा इस संसाररूपी महासागर में नाव के समान है। इस नाव के सहारे वे सुरक्षितरूप से इस भवसागर को पार कर लेगी, इस बात का उन्हें पूरा विश्वास है।

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आज कुछ गुन लीजिये।
हाथ में हो गोमुखी
माला सदा हिलती रहे
नम्र ऊपर से बनें
भीतर छुरी चलती रहे।
‘वह वसुधैव बना कुटुंबकम्।'
आज युद्धजर्जर जगजीवन
पुनः करेगा मंत्रोच्चारण,
वह वसुधैव बना कुटुंबकम्
उसके मुख पर ज्योति नवल-सी!
जननी जन्मभूमि प्रिय अपनी, जो स्वर्गादपि चिर गरीयसी।
हे जनशक्ति महान!
जागो और जगाओ।
हम पृथ्वी पर स्वर्ग बनायेंगे
हम दुनिया नयी बसायेंगे
हम महाजागरण गर्जन कर
अविराम चेतना लायेंगे
हे मजदूर किसान!
जागो और जगाओ।
हम श्रम का वंदन करते हैं
मेधा का गायन करते हैं
हम मानव का निर्माण अमर
लख कर सुख गर्जन करते हैं
हे जीवन अभिमान!
जागो और जगाओ।
चिड़िया, तोते, कोयल, मैना, सबको ही यह अति प्यारा था।
महाराज, यह ही कुरूप तरु, शोभा में सबसे न्यारा था ॥
मैं जन्मा हूँ इस पर, जब इसकी शोभा थी नई-निराली।
अतः मुझे प्राणों से भी प्यारी है इसकी डाली-डाली ॥