Question
‘वह वसुधैव बना कुटुंबकम्।'

Answer

आज चारों ओर युद्ध का माहौल है। पर भारत मानव-जाति को युद्ध से छुटकारा दिलाने के लिए मंत्रोच्चार (सुझाव) के द्वारा विश्व में शांति का प्रचार करने में लगा है। वह पृथ्वी पर रहनेवाले सभी लोगों को परिवार की तरह मिल-जुलकर रहने की सीख दे रहा है।
 

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पायो जी मैंने राम रतन धन पायो।वस्तु अमोलक दी मेरे सत्गुरु कर किरपा अपणायो।जनम-जनम की पूँजी पाई जग में सबै खोवायो।खरचै नहिं, कोई चोर न लेवै दिन-दिन बढ़त सवायो।सत की नाव खेवटिया सतगुरु भवसागर तरि आयो।मीरा के प्रभु गिरिधरनागर हरखि-हरखि जस गायो।
सत की नाव खेवटिया सतगुरु भवसागर तरि आयो।

वह वसुधैव बना कुटुंबकम्
प्रभुजी तुम स्वामी हम दासा।
ऐसी भक्ति करै रैदासा।
प्रभुजी तुम चंदन हम पानी।
जाकी अंग अंग बास समानी।
हम श्रम का वंदन करते हैं
मेधा का गायन करते हैं
हम मानव का निर्माण अमर
लख कर सुख गर्जन करते हैं
हे जीवन अभिमान!
जागो और जगाओ।
नगर से बाहर बगीचे में
बना लें झोंपड़ी
दीप जैसी देह चमके
सीप जैसी खोपड़ी
तर्क करने के लिये
आ जाए कोई सामने
खुल न जाए पोल इस
भय से लगें मत काँपने।
पग घुघरू बांध मीरा नाची रे, पग घुघरू ....लोग कहैं मीरा भई बावरी, सास कहै कुलनासी रे।जहर का प्याला रानाजी ने भेजा, पीवत मीरा हाँसी रे।मैं तो अपने नारायण की, हो गई आपहि दासी रे।मीरां के प्रभु गिरिधरनागर, बेग मिलो अविनासी रे।
गरज उठे ब्यालीस कोटिजन, सुन ये वचन उछाह-भरे,
काँप उठे प्रतिपक्षी जन-गण, उनके अंतस्तल सिहरे,
आज नये युग के नयनों से ज्वलित अग्नि के पुंज भरे।
कौन सामने आयेगा, यह देश महान् हमारा है
भारतवर्ष हमारा है, यह हिन्दुस्तान हमारा है।
किये जा निष्काम सेवा
सब फलेच्छा छोड़कर
याद फल की जब सताए,
खा पपीता तोड़कर
स्वर्ग का झगड़ा गया
भय भी नरक का छोड़ दे
पाप-घट भर जाए तो
काशी पहुँच कर फोड़ दे।