विपणन का अर्थ-कुछ लोगों का मानना है कि वस्तुओं का क्रय और विपणन एक ही है। कुछ लोगों का मानना है कि विक्रय ही विपणन है तथा उनका मानना है कि विपणन की क्रिया किसी उत्पाद अथवा सेवा के उत्पादन के पश्चात् शुरू होती है। कुछ लोग इसकी व्याख्या वस्तु के व्यापार अथवा उनके रूपांकन के रूप में करते हैं। ये सभी व्याख्याएँ आंशिक रूप से सही हो सकती हैं लेकिन विपणन बहुत व्यापक अवधारणा है।
परम्परागत रूप में, विपणन को उन व्यावसायिक क्रियाओं का निष्पादन माना जाता है जिनके कारण वस्तु एवं सेवाएँ उत्पादक से उपभोक्ता तक पहुँचती हैं। विनिर्माण में लगी फर्मों को वस्तु एवं सेवाओं को उत्पादक से उपभोक्ता तक ले जाने के लिए कई प्रक्रियाएँ करनी होती हैं जैसे उत्पाद का रूपांकन अथवा व्यापार, पैकेजिंग, भण्डारण, परिवहन, ब्रांडिंग, विक्रय, विज्ञापन एवं मूल्य निर्धारण। इन सभी क्रियाओं को विपणन प्रक्रिया कहते हैं।
विपणन मात्र उत्पादन के बाद की क्रिया नहीं है। इसमें कई वे क्रियाएँ सम्मिलित हैं जो वस्तुओं के वास्तविक उत्पादन से पूर्व की जाती हैं तथा उनके विक्रय के पश्चात् भी जारी रहती हैं। वर्तमान में इस बात पर जोर है कि विपणन एक सामाजिक क्रिया है। यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें लोग वस्तु एवं सेवाओं का मुद्रा अथवा किसी ऐसी वस्तु में विनिमय करते हैं जिसका उनके लिए कुछ मूल्य हो।
फिलिप कोटलर के अनुसार, "यह एक सामाजिक प्रक्रिया है जिसके अनुसार लोगों के समूह उत्पादों का सृजन कर उन वस्तुओं को प्राप्त करते हैं जिनकी उनको आवश्यकता है तथा उन वस्तु एवं सेवाओं का स्वतन्त्रता से विनिमय करते हैं जिनका कोई मूल्य है।"
इस प्रकार विपणन एक सामाजिक प्रक्रिया है जिसको लोग बातचीत कर दूसरों को एक विशेष प्रकार से व्यवहार के लिए प्रेरित करते हैं जैसे किसी उत्पाद अथवा सेवा को क्रय करना। वह उन पर किसी प्रकार का दबाव नहीं डालते।
विपणन की विशेषताएँ
1. अपेक्षा एवं आवश्यकता-विपणन प्रक्रिया व्यक्ति एवं समूह को वह जो कुछ चाहते हैं उसे प्राप्त करने में सहायक होती है। अतः लोगों को विपणन प्रक्रिया में लगने के लिए प्रेरित करने का प्राथमिक कारण उनकी कुछ-न-कुछ आवश्यकताओं की पूर्ति करना है। अन्य शब्दों में, विपणन प्रक्रिया का पूरा ध्यान लोगों की एवं संगठनों की आवश्यकताओं पर होता है। एक विपणनकर्ता का कार्य किसी संगठन में लक्षित ग्राहकों की आवश्यकताओं की पहचान करना तथा उन उत्पाद एवं सेवाओं का विकास करना है जो इन अपेक्षाओं/अभावों की पूर्ति करते हैं।
2. उत्पाद का सृजन-विपणनकर्ता बाजार के लिए उत्पाद का निर्माण करता है। बाजार उत्पाद से अभिप्राय किसी वस्तु की अथवा सेवा की सम्पूर्ण प्रस्तावना से है, जिनके लक्षण हैं-आकार, गुणवत्ता, रुचि आदि जो एक निश्चित मूल्य पर, निश्चित स्थान व दुकान पर उपलब्ध है। बाजार में बेची जाने वाली वही वस्तु श्रेष्ठ मानी जाती है जिसका सृजन व विकास सम्भावित क्रेताओं की आवश्यकताओं एवं प्राथमिकताओं के विश्लेषण के पश्चात् किया जाता है। इस प्रकार आधुनिक विपणन में विपणनकर्ता उत्पाद के सृजन का कार्य भी करता है।
3. ग्राहक के योग्य मूल्य-क्रेता किसी वस्तु को खरीदने का निर्णय लेने से पहले यह देखता है कि वह वस्तु. उसकी लागत की तुलना.में उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति कितने मूल्य तक करती है। विपणनकर्ता का यह एक महत्त्वपूर्ण कार्य है कि वह उत्पाद को इतना मूल्यवान बनाये जिससे कि ग्राहक अन्य प्रतियोगी वस्तुओं की तुलना में इनको पसन्द करे तथा इनके क्रय का निर्णय ले।
4. विनिमय पद्धति-विपणन प्रक्रिया विनिमय पद्धति के माध्यम से कार्य करती है। क्रेता एवं विक्रेता विनिमय प्रक्रिया के माध्यम से अपनी इच्छित तथा आवश्यक वस्तुओं को प्राप्त करते हैं। वर्तमान युग में वस्तुओं का उत्पादन अलग-अलग स्थानों पर होता है तथा उनका विवरण विभिन्न मध्यस्थों के माध्यम से एक विस्तृत क्षेत्र में किया जाता है जिसमें वितरण के विभिन्न स्तरों का विनिमय होता है। विनिमय को इसीलिए विपणन का सार कहा गया है।
5. विपणन क्रियाएँ गैर-लाभ संगठनों में प्रासंगिक-विपणन की क्रियाएँ व्यावसायिक संगठनों तक ही सीमित नहीं हैं। विपणन क्रियाएँ गैर-लाभ संगठन जैसे अस्पताल, स्कूल, स्पोर्ट्स-क्लब एवं सामाजिक तथा धार्मिक संगठनों में भी उतनी ही प्रासंगिक हैं। यह इन संगठनों को अपने उद्देश्यों को प्राप्त करने में सहायता प्रदान करता है।