पुराणपुरुष स्वयंभू पिता प्रसिद्ध एक है।
फलानुसार कर्म के अवश्य बाह्य भेद हैं,
परंतु अंतरैक्य में प्रमाणभूत वेद हैं।
अनर्थ है कि बंधु ही न बंधु की व्यथा हरे,
वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।।
(i) मनुष्य मात्र बंधु- है से क्या तात्पर्य है?
क) मनुष्य मात्र के अलग-अलग कर्म होना
ख) मनुष्य मात्र को अलग-अलग समझना
ग) मनुष्य मात्र के द्वारा सहयोग करना
घ) मनुष्य मात्र को परस्पर भाई-बंधु समझना
(ii) अनर्थ क्या है?
क) भाई-भाई में घृणा का भाव न होना
ख) भाई का भाई से अलगाव
ग) भाई का भाई से लगाव
घ) भाई-भाई में सहानुभूति का भाव
(iii) प्रत्येक मनुष्य अपना बंधु केसे है?
क) एक देश में जन्म लेने से
ख) एक गाँव में जन्म लेने से
ग) एक परमात्मा की संतान होने से
घ) एक परिवार में जन्म लेने से
(iv) मनुष्य-मात्र में भेद क्यों उत्पन्न होता है?
क) भित्र खान-पान के कारण
ख) कर्मों की भिन्नता के कारण
ग)भिन्न देशों में जन्म के कारण
घ) भिन्न जलवायु के कारण
(v) कवि ने सभी मनुष्यों को क्या माना है ?
क) मित्र - शत्रु
ख) दोस्त - शत्रु
ग) भाई - बंधु
घ) भाई - शत्रु