जैसी करनी वैसी भरनी
ये उस समय की बात है जब मैं आठवीं कक्षा में पढ़ता था। मैं औसत वाला लड़का था। मेरी कक्षा में एक और लड़का था, जो पूरे स्कूल में अन्वल आता था। सारे शिक्षक भी उसकी तारीफ करते रहते थे। उसके प्रति मेरे मन में ईर्ष्या की भावना रहती थी। में ऐसे मौके की तलाश में रहता था, जब मैं उसे नीचा दिखा सकू। बहुत जल्द ही वो मौका मेरे सामने आ गया। हमारे स्कूल में एक परीक्षा का आयोजन हुआ, इसमें उत्तीर्ण होने वालों को सम्मानित किया जाता और आगे की पढ़ाई के लिए छात्रवृति मिलने वाली थी। मेरी चालाकी से उसके पास से नकल करने का कुछ सामान हमारे शिक्षक को मिल गया और उसे परीक्षा से बर्खास्त कर दिया गया। वहाँ पर तो में उत्तीर्ण हो गया, लेकिन बहुत जल्द ही मुझे अपनी गलती का एहसास हुआ। जब आगे की परीक्षा में में उत्तीर्ण नहीं हो पाया और मुझे उससे बाहर कर दिया गया। तब मुझे ये समझ में आ गया कि हम दूसरों के साथ जेसा करते हैं, हमारे साथ भी वैसा ही होता है।