प्रत्येक व्यक्ति के जीवन का कुछ न कुछ लक्ष्य अवश्य होता है। वह अपने भविष्य के बारे में तरह-तरह के सपने संजोता है तथा उस लक्ष्य को पाने के लिए कोशिश भी करता है; जैसे-कुछ युवक डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक आदि बनना चाहते हैं। मैंने भी अपने जीवनकाल के बारे में एक स्वप्न देखा है। मैं बड़ा होकर एक चिकित्सक बनना चाहता हूँ परंतु मेरे माता-पिता मुझे इंजीनियर बनाना चाहते हैं लेकिन मैंने प्रण लिया है कि मैं बड़ा होकर एक चिकित्सक ही बनूंगा।
सब लोग समझते हैं कि चिकित्सक के व्यवसाय में खूब आय होती है तथा आज के समय में लोग धनी व्यक्ति को ही सम्मान देते हैं, लेकिन मैंने चिकित्सक बनने का लक्ष्य धन की कमाई को ध्यान में रखकर निर्धारित नहीं किया है। मैंने यह लक्ष्य इसलिए निर्धारित किया है क्योंकि में आज देखता हूँ कि अधिकांश गरीब लोगों को चिकित्सा की सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हो पाती जिसके कारण उन्हें अत्यधिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है तथा कभी-कभी तो उनके परिवार के सदस्य की बिना उपचार के असमय ही मृत्यु हो जाती है या जीवन भर रोगों से घिरे रहते हैं। मैं एक चिकित्सक बनकर इन गरीब दीन-दुखियों की सेवा में भी कुछ समय लगाना चाहता हूँ। इसका अर्थ यह नहीं कि मैं अपने परिवार के लिए कुछ नहीं कमाऊँगा। धनी व्यक्तियों से पूरी फीस लँगा, पर अपनी कमाई का कुछ भाग गरीबों के लिए खर्च करूंगा। मैं कमाई के साथ-साथ समाज सेवा करके मनुष्य के कर्तव्य को पूरा करने का प्रयास करूंगा। इससे मैं समाज सेवकों एवं उनकी संस्थाओं से संपर्क करूंगा।
मैंने पढ़ा था-
यही पशु प्रवृत्ति है कि आप-आप ही चरे वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।
मैंने इसी कथन को अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया है तथा इसे पढ़ाई में चुने जाने के लिए अभी से प्रयासरत रहूँगा।